खडी बोली का लोक साहित्य | Khadi Boli Ka Lok Sahitya

खडी बोली का लोक साहित्य | Khadi Boli Ka Lok Sahitya Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

पास बहे में की गुजरी देव कर कमर है । इन बहीं में कन्या के लिये मनोरंजन और शिक्षण की सामग्री रहती है और छोटी-मोटी वृहल्लियों में सुखद अवसर उपस्थित करते हैं । यहाँ तक कि पर की का भी सरकार-सम्मान करना नई बहू के लिए आवश्यक या ।

लेखिका मे चामिक गीतों का भी अच्छा संग्रह और अध्ययन किया है। इनमें रणेश और तुलसी पूजा के गौत हैं, जो प्रायः सभी जनपदों में गाये जाते है। इनमें साथन के गीत सबसे अधिक महत्वपूर्ण है । मेरठ जनपद में सुछ लोकगाथाएँ भी गायी जाती हैं।

इनमें चंदना, [चन्द्रावल, निहालदे, गुण्या पीर, योपीचन्द भरपरी माथि की कोकरू पाए बढ़े रस से गायी जाती हैं। फान्नून में गारे जाने वाले होली के गीत भी आकर्षक होते हैं, जब कण्डो इमली गयराती है अर्थात् युवती स्त्री में मस्ती छा जाती है।

जात होता है कि प्राचीन काल से चले आते हुए चांचर या चर्चा के गीत थे जिन्हें गाती हुई युवती कन्या आपनी सखियों के साथ शिवपूजन के लिये निकलती थी। कांटा लागो रे देवरिया मार्य शैल चलो ना जाय-यह मेरठ जनपद का प्रसिद्ध बोल है जो गांव-गांव में सुनाई पड़ता है ।

पम्मी पनघट और खतो के गात भी िखयों में प्रचातिव है । इसी प्रकार पुख्यों में कोल्ह और चलाते समय मल्होर और पाहाए नामक गोलोजिका कुछ संघ्रह इस प्रत्यय में (पु १३९४)ह । मन्दर भी हीरोहा जाता है

योनिभाने वाले ऐसे दोहे हो जो बलमुझ परेली-मी जान हती थी, मानो कोई वायला मिसिया प्याकिर जब कण्डो इमली गयराती है अर्थात् युवती स्त्री में मस्ती छा जाती है।

लेखक सत्या गुप्ता-Satya Gupta
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 514
Pdf साइज़34.1 MB
Categoryसाहित्य(Literature)

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