धर्म कर्म रहस्य | Dharma Karma Rahasya

धर्म कर्म रहस्य | Dharma Karma Rahasya Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

देवताओं ने यज्ञ से यज्ञपुरुष ईश्वर का यजन किया और इसी कारण यज्ञ ही सब धर्मों ( कर्तव्यों ) का मूल हुआ । अतएव इस सृष्टि-यक्ष में यज्ञ द्वारा सहयोग करना धर्म और असहयोग अधर्म है। यह यज्ञ-घर्म मुख्य्य कर यही है

कि ईश्वर के निमित्त उनको एकमात्र आदर्श बनाकर अपने को और दूसरों को भी ऐसा स्वच्छ, पवित्र, निष्कल्मष, शुद्ध, निर्मल और निःस्वार्थ बनाने का यत्र करना जिससे अपने में और दूसरों में भी ईश्वर के दिव्य गुण,

सामर्थ्य आदि सृष्टि के हित के लिये प्रकाशित हो और ऐसा होने पर ईश्वर में सेवार्थ ( यज्ञार्थ ) ययात्मा की अर्पित कर और ब्रह्मानंद का लाभ कर उस ब्रह्मानंद को दूसरों में यज्ञ द्वारा वितरण करना अर्थात् दूसरों को उसके लाभ के योग्य बनाना।

मनुष्यशरीर पिण्डाण्ड ( छोटा मक्ाण्ड ) है और दोनों के प्राय: एक से सामग्री और नियम हैं। अनेकानेक अणु, परमाणु, इ आदि के सङ्गठन का परिणाम यह शरीर भी है जिनके भिन्न भिन्न रहने पर भी यधार्य में उनमें एकता है,

क्योंकि दे एक शरीर के हो अभिन्न रूप में भिन्न भित्न भाग हैं। उनका एकमात्र उद्देश्य शरीर के अधिष्ठाता जीवात्मा का प्राज्ञा-पालन और हित-साधन करना है। इसके सम्पा दन के लिये प्रथम वो उन सब ने अपने अपने

पृथकू स्वार्थ का स्वाहा ( यज्ञ ) कर दिया है र दूसरे दृढ़ सङ्ग द्वारा परस्पर अभिन्न होकर और एक बनकर केवल अपने द्वारा सर्वत्र व्यास हो गये (गीता अ्र० १० श्लोक ४२) जिसमें उनकी शक्ति

द्वारा सचराचर भी यज्ञ सम्पादन कर सहयोग दें। गोपालतापिनी उपनिपत् का बचन है-“स्वाह जग- देतत्सुरेताः । ईश्वर ने सुरेता होकर के स्वाहा अर्थात् प्रकृति का आश्रय करके जगत् का संचालन किया।

लेखक पंडित गंगानाथ-Pandit Ganganath
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 180
Pdf साइज़4.1 MB
Categoryप्रेरक(Inspirational)

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