धम्मपद | Dhammapada

धम्मपद | Dhammapada Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

-कोच्चि में अवधि में मणिनि मं अहासि मे ।ये तं न उपनप्हन्ति केरं तेसूगसम्मति ॥ ४॥ (अकोशीय मां अवधीत् मां अवैपीय् मां मे ।थे तय मोपनकम्ति वैरं तेपुपकान्यति ॥en) निषाद-ुे गाडी बिया’ ( पैसा) ओो ( नमें) नदीं रमये |

उनका वैर शान्त हो जाता है। मावती () काली (पनिक्षनी)५-न हि बेरेन वेरानि सम्मन्तीध कुदाचन । असून च सम्मन्ति एस धम्मो सनन्तनो ॥ ५॥ (म दि वैरेण वैराणि शाम्यन्तीइ सदाचन । अवैरेण च शाम्यन्ति, एप धर्मः सनातनः ॥ ५॥ )

अनुवाद-यहाँ ( ससार में ) वैरसे वैर कमी दास्त नहीं होता, जवैर से दी शान्त होता है, यही सनातन धर्म (=नियम )है। আषी (जर्मन) कोसम्पण गाणू-परे च न विजानन्ति मयमेत्य यमामसे ।

ये च तस्य विज्ञानन्ति सतो सम्मन्ति मेगा ॥ १॥ (परे च न विजानन्ति वयमत्र यंस्यामा । ये च तत्र विजागन्ति ततः शाम्यन्ति मेधगाः ॥ ६ ॥ )अनुवाद- न्यू (धाजग) नहीं जानते, कि हम इस ( संसार ) से जानेवाले हैं।

जो इसे जानते है, फिर ( जाने ) मनके (सभी विकार ) शान्त हो जाते हैं ।मुमाइपस्सिन्तं इन्द्रिपेष्स आर्दुतं । भोजनम्हि अपत्तन सीतं हीनपीरियं । तं वे पसहति मारो वातो रुक्ख व बुन्नलं ॥७॥

(शुभमनुपश्यन्तै विएण्त इन्द्रियेषु असंवृतम् । भोजनेऽमाध कुसीदं होनवीर्यम् ।तं वै प्रसति मारो वांतो वृक्षमिव बुर्ज्यव्भ् ॥ ७ ॥)अनुवाद–( को ) ुम ही शुम छऐेखते बिदरता है, एन्विरयोंमें संयम म फरमेपाला होता है,

जनमें मात्राको नहीं जानता और उद्योगहीन होता है, उसे मार ( प्रमकी बुआृचियाँ) ( बैसे ही ) पीड़त करता है, बैसे हुर्गछ मुझको दवा।ৎ-अुभाउुपस्सिं क्हिन्चं इन्द्रियेमु सुसंबुतं ।

मोजनम्हि च मशन्बू’ सदं आरद्धवोरियं । तं वे नष्पसहति मारो वातो सेलं ‘व पन्वतं ॥८ ॥(अमुभमनुपश्यन्त विदरन्तं इन्द्रियेषु सुसंवृतम् । मोजने व मात्रास’ शमं आरव्यवीर्यम् । तं वैन प्रसहते मारो वाता शैळमिष पर्वतम् ॥ ८ ॥ )

लेखक त्रिपिटकाचार्य-Tripitakachary
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 213
Pdf साइज़3.3 MB
Categoryसाहित्य(Literature)

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