ब्रह्म पुराण | Brahma Puran PDF In Hindi

सम्पूर्ण ब्रह्म पुराण हिंदी – Brahma Puran Pdf Free Download

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

ब्रह्म पुराण (संस्कृत: ब्रह्म पुराण, ब्रह्म पुराण) संस्कृत भाषा में हिंदू ग्रंथों की अठारह प्रमुख पुराण शैली में से एक है। यह सभी संकलनों में पहले महा-पुराण के रूप में सूचीबद्ध है, और इसलिए इसे आदि पुराण भी कहा जाता है।

इस पाठ का एक अन्य शीर्षक सौर पुराण है, क्योंकि इसमें सूर्य या सूर्य देवता से संबंधित कई अध्याय शामिल हैं। ब्रह्म पुराण वास्तव में भौगोलिक महात्म्य (यात्रा गाइड) और विविध विषयों पर अनुभागों का संकलन है ब्रह्म पुराण हिंदू धर्म के 18 पुराणों में से एक प्रमुख पुराण है।

इसे पुराणों में महापुराण भी कहा जाता है। पुराणों की दी गयी सूची में इस पुराण को प्रथम स्थान पर रखा जाता है। कुछ लोग इसे पहला पुराण भी मानते हैं। इसमें विस्तार से सृष्टि जन्म, जल की उत्पत्ति, ब्रह्म का आविर्भाव तथा देव-दानव जन्मों के विषय में बताया गया है।

नैमिषारण्यमें सूतजीका आगमन, पुराण का आरंभ तथा सृष्टि का वर्णन

यस्मात्सर्वमिदं प्रपञ्चरचितं मायाजगन्जायते यस्मिस्तिष्ठति याति चान्तसमये कल्पानुकल्पे पुनः ।

यं ध्यात्वा मुनयः प्रपञ्चरहितं विन्दन्ति मोक्षं ध्रुवं तं वन्दे पुरुषोत्तमाख्यममलं नित्यं विभुं निश्चलम् ॥

यं ध्यायन्ति बुधाः समाधिसमये शुद्धं वियत्संनिभं नित्यानन्दमयं प्रसन्नममलं सर्वेश्वरं निर्गुणम् ।

व्यक्ताव्यक्तपरं प्रपञ्चरहितं ध्यानैकगम्यं विभुं तं संसारविनाशहेतुमजरं वन्दे हरिं मुक्तिदम् ॥’

पूर्वकालकी बात है, परम पुण्यमय पवित्र नैमिषारण्यक्षेत्र बड़ा मनोहर जान पड़ता था । वहाँ बहुत-से मुनि एकत्रित हुए थे, भाँति भाँतिके पुष्प उस स्थानकी शोभा बढ़ा रहे थे।

पीपल, पारिजात, चन्दन, अगर, गुलाव तथा चम्पा आदि अन्य बहुत-से वृक्ष उसकी शोभा वृद्धिमें सहायक हो रहे थे। भाँति-भाँतिके पक्षी, नाना प्रकारके मृगोंका झुंड, अनेक पवित्र जलाशय तथा बहुत-सी बावलियाँ उस वनको विभूषित कर रही थीं।

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा अन्य जातिके लोग भी वहाँ उपस्थित थे। ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी- सभी जुटे हुए थे। झुंड को झुंड गाँएँ उस वनकी शोभा बढ़ा रही थीं। नैमिषारण्यवासी मुनियोंका द्वादशवार्षिक (बारह वर्षोंतक चालू रहनेवाला) यज्ञ आरम्भ था।

जौ, गेहूँ, चना, उड़द, मूंग और तिल आदि पवित्र अत्रोंसे यज्ञमण्डप सुशोभित था। वहाँ होमकुण्डमें अग्रिदेव प्रज्वलित थे और आहुतियाँ डाली जा रही थीं। उस महायज्ञमें सम्मिलित होनेके लिये बहुत-से मुनि और ब्राह्मण अन्य स्थानों से आये। स्थानीय महर्षियोंने उन सबका यथायोग्य सत्कार किया।

ऋत्विजोंसहित वे सब लोग जब आरामसे बैठ गये, तब परम बुद्धिमान् लोमहर्षण सूतजी वहाँ पधारे। उन्हें देखकर मुनिवरोंको बड़ी प्रसन्नता हुई, उन सबने उनका यथावत सत्कार किया।

सतजी भी उनके आसनपर विराजमान हुए। उस समय सब ब्राह्मण सूतजीके साथ वार्तालाप करने लगे। बातचीतके अन्तमें सबने व्यास-शिष्यं लोमहर्षणजी से अपना संदेह पूछा।

महामते ! आप सर्वज्ञ हैं, अतः हम आपसे कुछ प्रश्नोंका उत्तर सुनना चाहते हैं: बताइये, यह समस्त जगत् कैसे उत्पन्न हुआ? भविष्यमें इसकी क्या दशा होगी? स्थावरजङ्गमरूप संसार सृष्टिसे पहले कहाँ लीन था और फिर कहाँ लोन होगा?

लोमहर्षणजीने कहा- जो निर्विकार, शुद्ध, नित्य, परमात्मा, सदा एकरूप और सर्वविजयी हैं, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है। जो ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूपसे जगत्की उत्पत्ति, पालन तथा संहार करनेवाले हैं, जो भक्तोंको संसार सागरसे तारनेवाले हैं, उन भगवान्‌को प्रणाम है।

जो एक होकर भी अनेक रूप धारण करते हैं. स्थूल और सूक्ष्म सब जिनके ही स्वरूप हैं, जो अव्यक्त (कारण) और व्यक्त (कार्य) रूप तथा मोक्षके हेतु हैं, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है।

जो जगत्की उत्पत्ति, पालन और संहार करनेवाले हैं, जरा और मृत्यु जिनका स्पर्श नहीं करतीं, जो सबके मूल कारण हैं, उन परमात्मा विष्णुको नमस्कार है। जो इस विश्वके आधार हैं, अत्यन्त सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म हैं, सब प्राणियोंके भीतर विराजमान हैं, क्षर और अक्षर पुरुषले उत्तम तथा अविनाशी हैं, उन भगवान् विष्णुको प्रणाम करता हूँ।

जो वास्तवमें अत्यन्त निर्मल ज्ञानस्वरूप हैं, किन्तु अज्ञानवश नाना पदार्थोंके रूपमें प्रतीत हो रहे हैं, जो विश्वकी सृष्टि और पालनमें समर्थ एवं उसका संहार करनेवाले हैं, सर्वज्ञ हैं.

जगत के अधीश्वर हैं, जिनके जन्म और विनाश नहीं होते, जो अव्यय, आदि, अत्यन्त सूक्ष्म तथा विश्वेश्वर हैं, उन श्रीहरिको तथा ब्रह्मा आदि देवताओंको मैं प्रणाम करता हूँ।

तत्पश्चात् इतिहास-पुराणोंके ज्ञाता, वेद-वेदाङ्गोंके पारङ्गत विद्वान्, सम्पूर्ण शास्त्रोंके तत्त्वज्ञ पराशरनन्दन भगवान् व्यासको, जो मेरे गुरुदेव हैं, प्रणाम करके मैं वेदके तुल्य माननीय पुराणका वर्णन करूंगा।

पूर्वकालमें दक्ष आदि श्रेष्ठ मुनियोंके पूछनेपर कमलयोनि भगवान् ब्रह्माजीने जो सुनायी थी, वही पापनाशिनी कथा में इस समय कहूंगा। मेरी 2 वह कथा बहुत ही विचित्र और अनेक अर्थोवाली ८. होगी।

उसमें श्रुतियोंके अर्थका विस्तार होगा। जो इस कथाको सदा अपने हृदयमें धारण करेगा अथवा निरन्तर सुनेगा, वह अपनी वंश-परम्पराको न कायम रखते हुए स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होगा।

जो नित्य, सदसत्स्वरूप तथा कारणभूत अव्यक्त प्रकृति है, उसीको प्रधान कहते हैं। उसीसे पुरुषने इस विश्वका निर्माण किया है।

वरूप मुनिवरो ! अमिततेजस्वी ब्रह्माजीको ही पुरुष रूप समझो। वे समस्त प्राणियोंकी सृष्टि करनेवाले

तथा भगवान् नारायणके आश्रित हैं। प्रकृतिसे महत्तत्त्व, महत्तत्त्वसे अहङ्कार तथा अहङ्कारसे सब सूक्ष्म भूत उत्पन्न हुए। भूतोंके जो भेद हैं, वे भी उन सूक्ष्म भूतोंसे ही प्रकट हुए हैं। यह सनातन सर्ग है।

तदनन्तर स्वयम्भू भगवान् नारायणने नाना प्रकारकी प्रजा उत्पन्न करनेको इच्छासे सबसे पहले जलकी ही सृष्टि की। फिर जलमें अपनी शक्तिका आधान किया। जलका दूसरा नाम ‘नार’ है, क्योंकि उसकी उत्पत्ति भगवान् नरसे हुई है।

यह जल पूर्वकालमें भगवान्का अयन (निवासस्थान) हुआ, इसलिये वे नारायण कहलाते हैं। भगवान्ने जो जलमें अपनी शक्तिका आधान किया, उससे एक बहुत विशाल सुवर्णमय अण्ड प्रकट हुआ। उसीमें स्वयम्भू ब्रह्माजी उत्पन्न हुए-ऐसा सुना जाता है।

पीछे रखकर काम और लोभमें प्रवृत्त हो गया । उसने धर्मको मर्यादा भङ्ग कर दी और वैदिक धर्मोका उल्लङ्कन करके वह अधर्ममें तत्पर हो गया। विनाशकाल उपस्थित होनेके कारण उसने

यह क्रूर प्रतिज्ञा कर ली थी कि ‘किसीको यज्ञ और होम नहीं करने दिया जायगा। यजन करते योग्य, यज्ञ करनेवाला तथा यज्ञ भी मैं ही हूँ। मेरे ही लिये यज्ञ करना चाहिये। मेरे ही उद्देश्यसे हवन होना चाहिये।

इस प्रकार मर्यादाका उल्लङ्घन करके सब कुछ ग्रहण करनेवाले अयोग्य वेनसे मरीचि आदि सब महर्षियोंने कहा-‘वेन! हम अनेक वर्षोंके लिये यज्ञकी दीक्षा ग्रहण करनेवाले हैं।

तुम अधर्म न करो। यह यज्ञ आदि कार्य सनातन धर्म है।’करनेवाला इस भूतलपर कौन है? मैं ही सम्पूर्ण प्राणियोंकी और विशेषत: सब धर्मोकी उत्पत्तिका कारण हूँ। तुम सब लोग मूर्ख और अचेत हो,

इसलिये मुझे नहीं जानते। यदि मैं चाहूँ तो इस पृथ्वीको भस्म कर दें, जलमें बहा दूं या भूलोक तथा द्युलोक का भी रूँध डालू। इसमें तनिक भी अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।’

जब महर्षिगण देनको मोह और अहङ्कारसे किसी तरह हटा न सके, तब उन्हें बड़ा क्रोध हुआ। उन महात्माओंने महाबली वेनको पकड़कर बाँध लिया। उस समय वह बहुत उछल-कूद मचा रहा था।

महर्षि कुपित तो थे ही. वेनकी बायीं जवाका मन्थन करने लगे। इससे एक काले रंगका पुरुष उत्पन्न हुआ, जो बहुत ही नाटा था। यह भयभीत हो हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।

शतरूपाने वैराज पुरुषके अंशसे वीर, प्रियव्रत | और उत्तानपाद नामक पुत्र उत्पन्न किये। वीरसे काम्या नामक श्रेष्ठ कन्या उत्पन्न हुई जो कर्दम प्रजापतिकी धर्मपत्नी हुई।

काम्याके गर्भसे चार पुत्र हुए-सम्राट्, कुक्षि, विराट् और प्रभु प्रजापति अत्रिने राजा उत्तानपादको गोद ले लिया। प्रजापति उत्तानपादने अपनी पत्नी सूनृताके गर्भसे ध्रुव, कीर्तिमान्, आयुष्मान् तथा वसु-ये चार पुत्र उत्पन्न किये।

लेखक महर्षि वेदव्यास-Maharshi Vedvyas
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 423
Pdf साइज़32.1 MB
CategoryReligious

ब्रह्मापुराण गीता प्रेस – Bramha Puran Book/Pustak Pdf Free Download

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