भागवत चर्चा | Bhagwat Charcha

भागवत चर्चा | Bhagwat Charcha Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

अर्जुन पूछता श्रीकृष्ण ! यह पुरुष इच्छा न करना भी किसकी प्रेरणासे पाप करता है? मानो कोई जबरदस्ती उसे पापों लगा रहा हो। इसके उत्तर में श्रीकृष्ण कहते हैं-

जो इस पुरुषको पापमें प्रवृत्त करता है, वह रजोगुणसे उत्पन्न हुआ काम है यह काम ही कोषका रूप धारण कर लेता है, यह काम महाशाल है अर्थात् कभी पूर्ति होती ही नहीं ।

अतरव इसी कामको तुम अपना बैरी जानो । परेच्छा-प्रारम्भका भोग दूसरेको प्रसन्न करनेके लिये होता है । अतएव इन पापोंको कौन टाल सकता है। इनसे घबरानेकी नहीं ।”

माईजीके इस उपदेशका मर्म में बैक-ठीक समझ नहीं सका । पिर – एक बार एक जगह साधुओं की एक मण्डली आयी । तीन साधु थे । उनमें जो प्रधान साधु थे, वे नग्न थे;

उनके साथ एक युवती खी थी। उनके आचरण पर कुछ संदेह होनेपर मैंने पता लगाया तो माझ्म हुआ कि युवती सदा साधुजीके पास रहती है और उसके साथ उसकी सम्बन्ध पवित्र नहीं है।

मैंने साहस करके साधुनीसे इसका कारण पूछा तो उन्होंने पहले तो यह कहा कि नको इससे क्या मतलब है, इनसे कोई उपदेश लेना हो तो पूछे । मैने जब नम्रतापूर्वक आग्रह किया,

तब उन्होंने जोशमें आकर कहा कि हम अशास्त्रीय कुछ भी नहीं कर रहे हैं । कीके साथ रहनेसे हमारे आत्मबोधमें कुछ भी फर्क नहीं पड़ता । स्वामीकी पञ्चदशीको मैंने देखा है|

पक्ष- दशी वेदान्तका बहुत ही उपादेय और मान्य ग्रन्थ है। विषारण्य त्वामीकी महान् विद्वत्ता के सामने सहज ही मनुष्यका सिर हुक जाता है । फिर आचार्य के नाते तो वे हम सबके परम पूज्प हैं,

ऐसी दशामें मुद्र-सरीला साधारण मनुष्य उनके शब्दों पर क्या आलोचना कर सकता है । दीवार तक आचार्योंके चरणोंमें कैठकर अद्धापूर्वक स्वाभ्यास करनेसे ही उनके रहस्य जाना बा सकता है ।

लेखक हनुमान प्रसाद-Hanuman Prasad
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 289
Pdf साइज़4.1 MB
Categoryधार्मिक(Religious)

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