आनंद की लहरे | Anand Ki Lahre

आनंद की लहरे | Anand Ki Lahre Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

‘पुत्र, स्त्री और धनसे सच्ची तृप्ति नहीं हो सकती। यदि होती तो अबतक किसी-न-किसी योनिमें हो ही जाती। सची तृप्तिका विषय है केवल एक परमात्मा, जिसके मिल जानेपर जीव सदाके लिये तृप्त हो जाता है।

दुःख मनुष्यत्वके विकासका साधन है । सच्चे मनुष्यका जीवन दुःखमें ही खिल उठता है। सोनेका रंग तपानेपर ही चमकता है।नित्य हँसमुख रहो, मुखको कभी मलिन न करो, यह निश्चय कर लो कि शोकने तुम्हारे लिये

जगत्में जन्म ही नहीं लिया है। आनन्दस्वरूपमें सिवा हंसने के चिन्ताको स्थान ही कहाँ है।’सर्वत्र परमात्माकी मधुर मूर्ति देखकर आनन्दमें मग्न रहो; जिसको सब जगह उसकी मूर्ति दीखती है. वह तो स्वयं आनन्दस्वरूप ही है।

‘शान्ति तो तुम्हारे अन्दर है। कामनारूपी डाकिनीका आवेश उतरा कि शान्तिके दर्शन हुए। वैराग्यके महामन्त्रसे कामनाको भगा दो, फिर देखो सर्वत्र शान्तिकी शान्त मूर्ति ।’जहाँ सम्पत्ति है, वहीं सुख है,

परन्तु सम्पत्तिके भेदसे ही सुखका भी भेद है। दैवी सम्पत्तिवालोंको परमात्म-सुख है, आसुरीवालोको आसुरी-सुख और नरकके कीड़ोंको नरक-सुख।’किसी भी अवस्थामें मनको व्यथित मत होने दो।

रखो, परमात्माके यहाँ कभी भूल नहीं होती और न उसका कोई विधान दयासे रहित ही होता है।’परमात्मा पर विश्वास रखकर अपनी जीवन-डोरी उसके चरणोंमें सदाके लिये बाँध दो, फिर निर्भयता

तो तुम्हारे चरणों की दासी बन जायगी।”बीते हुएकी चिन्ता न करो, जो अब करना है, उसे विचारों और विचारो यही कि बाकीका सारा जीवन केवल उस परमात्माके ही काममे आवे।धन्य कही है,

जिसके जीवनका एक एक क्षण अपने प्रियतम परमात्माकी अनुकूलता बोलता है,चाहे वह अनुकूलता संयोगमें हो या वियोगमें, स्वर्गमें हो या नरकमें, मानमें हो या अपमानमें, मुक्तिमें हो या बन्धनमें।’सदा अपने हृदयको टटोलते रहो,

लेखक हनुमान प्रसाद-Hanuman Prasad
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 34
Pdf साइज़28.3 MB
Categoryउपन्यास(Novel)

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