निबन्ध माला | Nibandh Mala

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पुस्तक का एक मशीनी अंश

भाव या मनोविकार

अनुसूति के द्वन्द्व ही से प्राणी के जीवन का आरम्भ होता है। उच्च प्राणी मनुष्य भी केवल एक जोड़ी अनुभूति लेकर इस संसार में जाता है। बच्चे के छोटे-से हृदय में पहले सुख और दुःख की सामान्य अनुभूति भरने के लिए जगह होती है।

पेट का भरा या खाली रहना ही ऐसी अनुभूति के लिए पर्याप्त होता है। जीवन के आरम्भ में इन्हीं दोनों के चिह्न हँसना और रोना देखे जाते है पर ये अनुभूतियां बिलकुल सामान्य रूप में रहती है,

विशेष विशेष विषयों की ओर विशेष विशेष रूपों में ज्ञानपूर्वक उन्मुख नहीं होती । नाना विपयों के दोष का विधान होने पर ही उनसे सम्बन्ध रखने वाली इच्छा की अनेकरूपता के अनुसार अनुभूति के भिन्न-भिन्न योग संघ टित होते है

जो भाव या मनोविकार कहलाते हैं। अतः हम कह सकते है कि सुख और दुःख की मूल अनुभूति ही विषय-भेद के अनुसार प्रेम, हास, उत्साह, आश्चर्य, क्रोध, भय, करुणा, घृणा इत्यादि मनोविकार का जटिल रूप धारण करती हैं।

जैसे यदि शरीर में कहीं सुई चुभने की पीड़ा हो तो केवल सामान्य दुःख होगा; पर यदि साथ ही यह ज्ञात हो जाय कि सुई चुमानेवाला कोई व्यक्ति है तो उस दुःख की भावना फई

मानसिक और शारीरिक वृत्तियों के साथ संश्लिप्ट होकर उस मनोविकार की योजना करेगी जिसे क्रोध कहते है । जिस बच्चे को पहले अपने ही दुःख का ज्ञान होता था,

बढ़ने पर असंलक्ष्यक्रम अनुमान द्वारा उसे और बालकों का कष्ट या रोना देखकर भी एक विशेष प्रकार का दुःख होने लगता है जिसे दया या करुणा कहते हैं।

इसी प्रकार जिस पर अपना वश न हो ऐसे कारण से कष्ट पहुँचाने वाले भावी अनिष्ट के निश्चय से जो दुःख होता है वह भय कहलाता है। बहुत छोटे बच्चे को, जिसे यह निश्चयात्मिका बुद्धि नह

लेखकलक्ष्मी सागर-Lakshmi Sagar
भाषाहिन्दी
कुल पृष्ठ180
Pdf साइज़8.2 MB
Categoryनिबंध(Essay)

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