विरजानंद प्रकाश | Virjanand Prakash

विरजानंद प्रकाश | Virjanand Prakash Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

श्री विरजानन्द ने घर पर व्याकरण के अतिरिक्त कुछ पञ्चतन्व अन्यया हितोपदेश भी अवश्य पढ़ा या । यतः जब इन्होंने पर छोड़ा था तो ये संस्कृत-भारण कर लेते थे और उसी समय से इन्होंने संस्कृत को अपनी व्यावहारिक भाषा बना लिया था ।

‘विरजानन्द फारसी के भी उत्कृष्ट विद्वान थे। यह बात हम आगे कहेंगे । इसमें उत्कर्ष तो आगे शनैः २ प्राप्त हुआ होगा, और इसका विशेष अध्ययन सम्भवतः कालिकाता-निवास काल में हुआ होगा । तथापि व फारसी लिपि, उर्दू भाषा के लेखन-पटन से परिचित अपनी चक्षुष्मना के काल में ही हो चुके थे,

इसमें सन्देह नहीं । यह उर्दू अध्ययन पितृचरणों से हुआ, अथवा किसी अन्य से यह हमें ज्ञात नहीं । पर चक्षुष्मना काल में हो अवश्य चुका या ।पितृचरण के स्वर्गवास के स्वस्पकाल पश्चात् ही वात्सल्य प्रतिमा माता जी भी पतिमार्गानुसारिणी हो गई इ

स प्रकार बारहवें वर्ष में ये शरीर-यात्रार्थ भाई-भावज के आश्रित हो गए। इस प्रत्यु- पफार में असमर्थ, बि-नेत्र जन्तु के अन्न वस्त्र का व्यय-यहन नए अभिभावकों (भाई-भावज ) को असह्य होने लगा और इनके साथ दुर्व्यवहार की मात्रा बढ़ती गई ।

भारद्वाज जी, बाल्यकाल ही तेजस्वी, आ्मरगीरव-भावभरित तथा उग्रस्वभाव फे ये अतः वे उत्तेजक व्यन-वृष्टि तथा कटुक वर्गमयी परुपभाषा को मीन हो सहने में सुतरां असमर्थ थे । दे ऐसे अवसरों पर भाई-भावज की आलोचना तथा विरोध प्रकट करते थे, और शीघ्र ही गङ्गापुर में दुबांसा नाम से प्रसिद्ध हो गए।

तथापि व फारसी लिपि, उर्दू भाषा के लेखन-पटन से परिचित अपनी चक्षुष्मना के काल में ही हो चुके थे, इसमें सन्देह नहीं । यह उर्दू अध्ययन पितृचरणों से हुआ, अथवा किसी अन्य से यह हमें ज्ञात नहीं । पर चक्षुष्मना काल में हो अवश्य चुका या ।पितृचरण के स्वर्गवास के स्वस्पकाल पश्चात्

लेखक भीमसेन शास्त्री-Bhimsen Shastri
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 128
Pdf साइज़9 MB
Categoryविषय(Subject)

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