तात्विक प्रवचन | Tatvik Pravachan

तात्विक प्रवचन | Tatvik Pravachan Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

अब तक मैंने जो कुत्र सुना, पडा मोर समझा है, उमका सार बताता हूँ। बह सार कोई नयी बात नही है, सबके अनुभव की बात है। मनुष्य का स्वभाव है कि वह सदा नयी-नयी बात चाहता है ।

वास्तव में नयी बात वही है, जो सदा रहने वाली हे। उस बात की भोर याप ध्यान दें। वहुत-ही लाभ की बात है, पार बहुत सीधी मरल बात है। उसे धारण कर ले ।

ढ़ता से मान ले तो अभी वेडा पार है अभी चाहे ऐसा अनुभव न हो, पर श्रागे धनुभव हो जायगा-यह निश्चित है। विद्या समय पाकर पकती ह विद्या कालेन पच्यते”।

अत आप उस मार बात को मान हो मान ले । जैसे, खेती करने वाले जमीन मे बीज बो देते हैं, योर कोई पूछे तो कहते हैं-खेती हो गयी । ऐसे ही में कहता हू कि उस बात को दृढतापूर्वक मान लें तो कल्याण हो गया ।

हां, जिसको विशेष उत्कण्ठा होगी, उसे तो अभी तत्व का अनुभव हो जायगा, और कम उत्कण्ठा होगी तो अनुभव में देर लगेगी ।यह जो समार है, यह प्रतिक्षण नाश की र जा रहा है

यह सार बात है साधारण-सी वात दीखती है, पर बहुत बडी सार बात है। यह देखने, सुनने, समझने में पुराना वाला ससार एक क्षण भी टिकता नही, निरन्तर जा रहा है जितने भी जीवित प्राणी हैं,

सब-के-सब मृत्यु में जा रहे है । सारा ससार प्रलय में जा रहा है। सब कुछ नष्ट हो रहा है । जो दृश्य है, वह पदषय हो रहा है । दर्शन प्रदर्शन गे जा रहा है । भाव अभाव में परिणत हो रहा है। यह सार बात है।

लेखक Gita Press
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 90
Pdf साइज़1.6 MB
Categoryप्रेरक(Inspirational)

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