तत्त्व चिन्तामणि सातों भाग एक साथ | Tattva Chintamani All Seven Parts

तत्त्व चिन्तामणि सातों भाग एक साथ | Tattva Chintamani All Seven Parts Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

काम-क्रोधादि विकारोंका नाश करना ही उचित सिद्ध होता है और यदि कहीं यही बात सत्य हो कि जीवन्मुक्तके अन्तःकरणमें कोई विकार शेष नहीं रहता तब तो विकारोंका शेष रहना माननेवालेकी

केवल मुक्ति नहीं होगी सो ही बात नही, परन्तु उसकी और भी बड़ी हानि होगी; क्योंकि वह मिथ्या ज्ञानसे (गीता १८। २२के अनुसार) ही अपनेको ज्ञानी और मुक्त मानकर अपने चरित्र-सुधारके पवित्र

कार्यसे भी वञ्चित रह जायगा और काम-क्रोधादि विकारोंके मोहमय जालोंमें फँसकर अनेक प्रकारकी नरक-यन्त्रणा भोगता हुआ (गीता अध्याय १६के श्लोक १६ से २० के अनुसार) लगातार संसार-चक्रमें भटकता फिरेगा ।

इसलिये यही सिद्धान्त सर्वोपरि मानना चाहिये कि जीवन्मुक्तके अन्तःकरणमें काम क्रोध और हर्ष-शोकादि कोई भी विकार शेष नही रह जाते ।इसके सिवा मुक्तिके सम्बन्धमें लोग और भी अनेक

प्रकारकी शंकाएँ किया करते हैं पर लेख बढ़ जानेके कारण उन सबपर विचार नही किया गया।तू केवल मुझ सचिदानन्दघन वासुदेव परमात्मामें ही अनन्य प्रेमसे नित्य, निरन्तर अचल मनवाला हो और मुझ

परमेश्वरको ही अतिशय श्रद्धा-भक्तिसहित निष्काम भावसे नाम, गुण और प्रभावके श्रवण, कीर्तन, मनन और पठन-पाठनद्वारा निरन्तर भजनेवाला हो तथा मेरा (शंख, चक्र, गदा, पद्म और किरीट, कुण्डल आदि

भूषणोंसे युक्त पीताम्बर, वनमाला कौस्तुभमणिधारी विष्णुका) मन, वाणी और शरीरके द्वारा सर्वस्व अर्पण करके अतिशय श्रद्धा भक्ति और प्रेमसे विह्वलतापूर्वक पूजन करनेवाला हो और मुझ सर्वशक्तिमान्,

विभूति, बल, ऐश्वर्य, माधुर्य, गम्भीरता, उदारता, वात्सल्य और सुहृदता आदि गुणोंसे सम्पन्न,सबके आश्रयरूप वासुदेवको विनयभावपूर्वक भक्तिसहित साष्टांग दण्डवत्-प्रणाम कर, ऐसा करनेसे तू

मेरेको ही प्राप्त होगा, यह मैं तेरे लिये सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ; क्योंकि तू मेरा अत्यन्त प्रिय सखा है।’अतएव सर्व धर्मोको अर्थात् सम्पूर्ण कमोंके आश्रयको त्यागकर केवल एक मुझ सचिदानन्दघन वासुदेव परमात्माकी ही अनन्य शरणको प्राप्त हो;

लेखक जयदयाल गोयन्दका-Jaydayal Goyandka
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 1040
Pdf साइज़43.4 MB
Categoryधार्मिक(Religious)

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