सुर पंचरत्न | Sur Panchrathn

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पुस्तक का एक मशीनी अंश

तथा उनमें तालमात्रा की नाप-जोख करना उतना स्वामाविक नहीं होता जितना की पदों में होता है गाने के लिये इनौं गीतों का प्रवार पदले से रहा है। तुलसीदासजी ने भी अपने गेम’ कार्य के लिये हम पदा का प्रयोग किया है, इसी कारण सूरदास जी की संपूर्व गेय-कविता इन्दी पदों में है,

पदों के लिये छन्दःयान में कोई विशेष नियम नहीं लिखा गया है। पदों की पहिली पंक्ति और पंक्तियों की अपेक्षा छोटी होती है और प्रत्येक दो चरणों के बाद इसकी आवृत्ति की जाती है। इसको ‘स्वाई’ पद या * टेक कहते हैं। इसमें एक प्रकार से सारे पद का निर्योद सा र है ।

अन्य सब चस्यों में मात्राएँ बराबर रहती है और प्रवाह भी एक सा रहता है, नहीं तो उसमें राग-तालानुकूल बंधान काँचने में बड़ी दिक्ृत पढ़ती है। सूरदासजी के पदों में ये सभी लक्षण वर्तमान है। इनके सभी पदों में (कतिपय पदो को क्षौर) चारा प्रावादिक यति बड़ी तुम्हर है।

उन कतिपय पदों की गति विशाइने का दोष हम सूरदात ‘ जी को नहीं दे सकते । गै ब कविता में भूति-दोष से हन बातो का होना असंभव नहीं है, पर इससे इनके पदों के गाने में कोई कठिनता नहीं होती। यह दोष पर निर्भर रहता है। सफल गायक इन दोषों को प्रासानी से छिपा सकता है।

तुकान्त के सम्बन्ध में पदों का नियम तो यही है कि स्थायी पद के अनुसार सभी पदों का एक टुक होना चाहिये । यही सर्वोत्तम सिद्धान्त है, क्योंकि स्थायी पद बार बार करना पड़ता है। इस प्रकार के एक नदी अनेक पद उदाहर स्वरूप अंथ में वर्तमान है।

एक तुकान्त न होने से कुछु खटकता खा है। इससे कुछ घट कर नियम यह है कि पद सम विषम तुकान्त हो सकते हैं, किस्तु इनमें मी यह स्याल रखना चाहिये कि तुकांत में बगे का क्रम एका हो। जैसे

लेखक मोहनवल्लभ-Mohanvallabh
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 370
Pdf साइज़67 MB
Categoryसाहित्य(Literature)

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