श्री अमरापुर वाणी | Shri Amrapur Vani

श्री अमरापुर वाणी | Shri Amrapur Vani Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

पौर भवन सब दुःख मय त्यागे, अपने घर में पायो रे । पांच कोण का खोलि किबाड़ा, प्रात्म दर्शन पायो रे ।। जोव ईवा की टूटे उपाधी, वृति कवह्या समायो रे कहता टेऊ बन्धन तोड़े, निर्भय नगर बसायो रे ॥

राग रामकली सद्गुरु कृपा करके, मुझ को साची सीख सुनाई रे ॥|टेक स्वास स्वास सिमरन कर मैं, आठ पहिर लिवलाई रे । आशा तृष्णा ममता त्यागे, मन की मैल मिटाई रे ।

गुरु मन्त्र से प्रीति लगाई, और बात बिसराई रे । आत्म पद में स्थित होकर, सहज समाधी लगाई रे । जागृत स्वप्न सुषोप्ति छोड़े, तुरिया ताड़ी लाई रे । निरभय घर में बासा करके, जम को चिन्त चुकाई रे ॥

कहता टेऊ हृदय भीतर, अनुभव ज्योति जगाई रे । अन्तर बाहिर भया उजियाला, अविद्या रहो न राई रे।।राग रामकली यह शिक्षा उर धरनारे, मन यह शिक्षा उर धरना रे ॥

धीरज धर्म दया को धारे, सत्कर्मों को करना रे । सत्पुरुषों का सत्संग करके, आज्ञा माँहि विचरना रे ।। काम क्रोध मद लोभ मोह पुनि, पांच विषय को हरना रे । कूड़ कपट छल चोरी यारी, डाका पन से डरना रे ।

वृथा जन्म गाया क्यों तुम, वृथा जन्म गाया रे सेवा सिमरण यज्ञ दान से, मानुष तन यह पाया रे साध सगन्ति नहीं कबहुं कीनी, दुर्जन का संग भाया रे पाप कर्म बहु छल बल करके,

धन को बहुत रे दीनजनों को दान न दीना, नहीं खर्चा नहीं खाया रे गंगा आदि तीर्थ- में जा, फिर फिर जन्म बिताया रे आत्म तीर्थ को नहीं , ज्ञान गंग नहीं नाया रे भाव कर्म तजि, काम्य कर्म रे कहता टेऊ भोग विषय में, स्वास रे

लेखक टेऊँराम जी-Teuram Ji
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 184
Pdf साइज़23.4 MB
Categoryसाहित्य(Literature)

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