सेवा निष्ठा | Seva Nishtha

सेवा निष्ठा | Seva Nishtha Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

यात्रा वहींसे प्रारम्भ होती है जहाँ मनुष्य रह रहा होता है। इसी प्रकार साधनाका उपक्रम भी वहीं से होता है जहाँ साधककी स्थिति होती है। यदि अपनी स्थितिसे उच्चकोटिकी साधना की जाये तो उसमें स्थिरता आना कठिन होता है, बार-बार गिर पड़ते हैं।

इसकी अपेक्षा तो यदि नीचेके स्तर से साधनाका आरम्भ हो तो शीघ्र ही उन्नति-प्रगतिका अनुभव होने लगता है। अतः अपनी स्थितिके अनुसार साधनामें प्रवृत्त होनेसे अनायास सफलताके दर्शन होने लगते हैं।

हम कहाँ रह रहे हैं, इसका पता अपने आपको चलना कठिन होता है। इसका कारण यह है कि मनुष्य अपने व्यवहारमें कुछ आसक्ति, कपट या दम्भ अवश्य रखता है।

इनका अभ्यास संस्कार इतना गाढ़ हो जाता है कि वह स्वयंको वैसा ही समझने लगता है। इससे अपने बारेमें निरीक्षण, परीक्षण अथवा समीक्षण करने की योग्यता क्षीण हो जाती है।

जिस सूक्ष्म-दृष्टिसे वह दूसरोंको देख पाता है वैसी दृष्टि अपने आप पर नहीं डाल पाता। जैसे अपने नेत्रोंकी पुतली अपनी आँखसे नहीं दिखती वैसे ही अपने गुण-दोष भी मनुष्यको नहीं दीखते, क्योंकि अपना आत्मा उनसे एक हो गया है ।

जो दूसरेके बारेमें गुप्त-से-गुप्त बातका अनुमान लगा लेता है वह अपने बारेमें गहरे पानीमें ही डूबा रहता है। अतः आत्मनिरीक्षणके लिए किसी सूक्ष्म दृष्टि सम्पन्न सत्पुरुषकी आवश्यकता होती है।

हमारी त्रुटियोंको बतानेके लिए अन्तर्दर्शी सत्पुरुषकी आवश्यकता है। उसकी हित भावना पर विश्वास होना भी आवश्यक है। जिसके जीवनमें अपने किसी हितैषीपर पूरा विश्वास नहीं हो उस संशयालुको कभी शान्ति नहीं मिल सकती ।

उसका अहंकार कितना बड़ा है और वह कितना असहाय है इस बातको वह समझ नहीं पाता। अपने लक्ष्य प्रति भी वह आस्थावान् नहीं है, क्योंकि अपने लक्ष्यवेधके प्रति यदि उत्साह और तत्परता होती

तो वह झूठा अहंकार छोड़कर अपनी त्रुटियोंको समझने, मानने और दूर करनेके लिए प्रयत्नशील हो जाता । वस्तुतः वह अपनी नासमझीको ही बड़ी समझदारी मानकर सत्यसे विमुख हो रहा है।

लेखक स्वामी अखण्डानन्द सरस्वती-Swami Akhandanand Saraswati
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 24
Pdf साइज़1 MB
Categoryसाहित्य(Literature)

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