सावन का सेनापति | Savan Ka Senapati

सावन का सेनापति | Savan Ka Senapati Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

गोपाल कहते दश्नन का नहिं चलता चारा ना ॥ कजरी शारदा विलकी ॥ ३ ॥ बार बार शारदा पैर में बलिहारी मोरे वलम् । पास कराया क्लि भारत हितकारी मोरे बलमू। टेक। बालेपनमें करके शादी होते थे सब लोग निहाल ।

बल विद्या धन धर्म गवा के दिन पर दिन होते कंगाल ।। वृद्ध वेल के संग में केतनी व्याही जाती अबोध बाल । वेत वेचके लड़की को कैसे बन जाते कोठी वाल ।।

अपने नित मौज उड़ावें । लड- किन पर छुरी चलावें । ना समझाये मे समर्थे मुख अनारी मोरे बलमू । इसी वजह से भारत की केतनी नारी कमसीन सुनो । गैरों के संग नि- कलके भागे होकर के बेदीन सुनो ॥

केतनी ठोकर खाती फिरनी हो कौड़ी के तीन सुनो । पाप करे छिप छिपके घरमें घरकी रहेकुलीन सुनो ॥ विधवा बनके रहती हैं, दुसपर्दुख नित सहती हैं। कलप २ सावन का सनापाव नित रोती हैं दुखियारी मोरे बलम् ॥

समझाने से तनिक नमाने आखिर में फिर होय निरास । बना शारदा विलको फौरन किया पेस कौंसिलमें खास। ओनइस से ओन तिस पहिली श्रक्टूबरको करबाया पास । मुसलमान हिन्दु दोनों मिल किया, भारत का दुख नास ॥

छःमास तलक से भाई । मोहलत था दिया सुनाई । कुल जातिन पर एक रूल सर कारी मोरे लवली ॥ लड़की चौदह वरस की होवे लड़का रहे अठारह साल । इस्से कममें करें जो शादी हो जेहल उसको ततकाल ॥

कुछ लोभी पंडितोंके दिलमें इनवार्तों का हुआ मलाल । मजा मारते जो घर बैठे हम लोगों पर विछाके जाल ॥

उलटा सीधा समझाते। मनमानी पाठ पढ़ाते। इतने दिनकी छीन गई जमीदारी मोरे बलम् ॥ इन्हें धर्मका ख्याल नहीं है झूठी दोंग दिखाते हैं। साल पछत्तर के बूढ़े का यह शादी करवाते हैं ॥

लेखक गोपाल लाल गुप्त-Gopal Lal Gupt
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 24
Pdf साइज़1 MB
Categoryइतिहास(History)

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