सर्वोदय अर्थशास्त्र | Sarvoday Arthshastra

सर्वोदय अर्थशास्त्र | Sarvoday Arthshastra Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

अन्त में दुख ही होता है और दीकालीन रदि से उमाज और देश को हानि पहुंचती है, जस मादक या उत्तेजक पदायों तथा विलासिता आदि की वस्तुओं का सेक्न, अपने स्वार्थ के लिए हानिकर वस्तुओं का प्रचार या दूसरों का शोषण ।

इन दो प्रकार की आवरनकवाओं में प्रथम प्रकार की तो तच्चित और उनकी पूर्ति की जानी चाहिए। दूसरे प्रकार की आवश्यकताएँ, अनिष्ट कारी हैं, इनका नियंत्रण होना आवश्यक है।

मनोनिग्रह या इन्द्रिय-दमन-जो व्यक्ति अधिक तथा स्थायी संतोष और सुख पाना चाहता है, उसे अपने मन और इन्द्रियों को वश में रखना बहुत जरूरी है। हमें अपनी कृत्रिम या ऐसी आवश्यकताओं को नियंत्रित करना चाहिए बो हमारी वास्तविक-शारीरिक,

मानसिक और आनिक-उत्रति में शक हो, जिनसे लोकहित में रुकावट होती है । अवश्य ही अपनी आवश्यकताओं के नियंत्रण में आदमी को प्रारम्भ में कुछ कष्ट प्रतीत होना स्वामाविक है, पस्तु धीरे-धीरे उसे इसका अभ्यास हो जाता है और उसे यह शकति प्रात हो जाती है,

विशे मगोनिम्रह या इन्द्रिय-दमन कहा जाता है। इस शक्ति से वट ऐटी आवश्यकताओं का नियंत्रण करे, जिनके कारण वह शौकीनी या मोग विलास के पदार्थों का उपयोग करने को प्रेरित होता है। हमारा आदर्श यह नहीं है कि सभी आवश्यकताओं को रोको,

-पीना भी बन्द कर दो और शरीर को सुखा रातो हमारा लक्ष्य यही होना चाहिए कि जीवन पात्रा के लिए आवश्यक बलुनो का उपयोग करो; पर इसमें विवेक से काम लो मर्पादा का ध्यान खो दूसरों के हित का भी विचार करो ।

जोश्रो और जीने दो-यही नहीं, दूसरों को जीवित रखने के लिए, समाज के मुख और कल्याण के लिए अपना जीवन पितायो। बालब में यही जीवन है; इसी में सच्चा और असली सुख है।

लेखक भगवानदास केला-Bhagvandas Kela
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 373
Pdf साइज़26.4 MB
Categoryअर्थशास्त्र(Economy)

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