सामधेनी | Samadheni

सामधेनी | Samadheni Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

यो शेष! निःशेष वीन का एक तार था मैं ही ! स्तंभ की सम्मिलित गिरा का एक द्वार था मैं ही! तब क्यों बाँध रखा कारा में ? अभय बहने दिया नहीं लहरों की खा चोट गरज ता; कभी शिलाओं से श्रहङ्कार प्राणों से धारा में।

ओ शेष ! निःशेष बीन का एक तार था मैं ही ! स्वभू की सम्मिलित गिरा का एक द्वार था मैं ही बन्या दह्यमान जीयन सका मन्दिर में अब तक वर्तिक नीराजन रहा मैं चेदि तुम्हारी, कु टिमटिम कुछ-कुछ अंधियारी।

और इधर निर्जन अरस्य “मि उद्भासित हो रही जीवन दीप्त जला दिशाएँ जाता है। ये देखो निधूम शिखाएँ। मुक में जो मर रही, जगत में कहाँ भारती बैसी ? जो अवमानित शिखा, किसी की कहाँ आरती वैसी ? भूल गये देवता, कि वज्ञिय गन्धसार था मैं ही, स्वभू की सम्मिलित गिरा का एक द्वार था मैं ही ।

ओ अशेष ! निःशेष बीन का एक तार था मैं ही ! स्वभू की सम्मिलित गिरा का एक द्वार था मैं ही!तब क्यों इस जम्बाल-जाल में मुझे फेंक मुसकाते हो तुम ? मैं क्या हँसता नहीं देवता, पूजा का बन सुमन थाल में

मेरी प्रखर मरीचि देखती ठा सान्द्र तम का अवगुण्ठन; देती खोल बद्ष्ट-प्रन्धि, संसृति का गूढ़ रहस्य पुरातन । थकी बुद्धि को पीछे तजकर मैं श्रद्धा का दीप जलाता, बहुत दूर चलकर धरती के हित पीयूष-कलश ले आता:

कर में उज्वल शंख, स्कन्ध पर लिये तुम्हारी विजय-पताका, अमृत-कलश-वाही धरणी का, दूत तुम्हारी भमर विभा का | चलता मैं फेंकते मलीमस पापों पर चिनगारी, सुन उद्ोघन-नाइ नींद से जग उठते नर नारी । भूल गये देवता, उदय का महोबार था मैं ही, स्व’ की सम्मिलित गिरी का एक द्वार था मैं ही

लेखक रामधारी सिंह दिनकर-Ramdhari Singh Dinkar
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 110
Pdf साइज़2.8 MB
Categoryकाव्य(Poetry)

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