राष्ट्रपिता बापू | Rashtrapita Bapu

राष्ट्रपिता बापू | Rashtrapita Bapu Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

गाँधीजी मांस शौक या स्वाद के लिये नहीं खाना चाहते थे। वे निडर साहसी, और बलवान बनना चाहते थे । इसलिये छिपकर किसी तरह वे माँस खाने को राजी हो गये जब-जब बाहर ऐसा भोजन करके आते, घर खाना न खाया जाता ।

मों से बहाना बना देते कि आज भूख नहीं है, खाना नहीं पचा । मगर जब वह झूठ बोलते, उन्हें बहुत दुःख होता। उन्होंने तो सत्य बोलने की प्रतिज्ञा की थी।अन्त में सत्य ने असत्य पर विजय पाई। गाँधीजी ने अनुभव किया कि भले ही माँस खाना जरूरी हो,

लेकिन माता पिता को धोखा देना और झूठ बोलना पाप है इसलिये उन्होंने निश्चय किया कि माता-पिता के जीते जी माँस न खाना चाहिए । सत्यवादी गाँधी ने अपने मित्र से यह बात साफ-साफ कह दी। वे सब कुछ सह सकते थे,

लेकिन माता-पिता से झूठ बोल कर, उन्हें धोखा देना नहीं चाहते थे । ऐसे थे सत्यवादी गाँधी !अपने एक रिश्तेदार के साथ गाँधीजी को सिगरेट पीने की भी आदत लग गई । उनके चाचा भी सिगरेट पीते थे । उनके सिगरेट पीकर फेंके हुए टुकड़े, उठा उठाकर ये पी लिया करते ।

परन्तु ये टुकड़े हमेशा उपलब्ध न होते तथा इनसे धुआँ भी बहुत नहीं निकलता । मुँह से धुआँ छोड़ने में ही इन्हें आनंद आता था ।अन्त में नौकर के पैसों में से एक-एक, दो-दो पैसे चुराकर बीड़ी खरीदने लगे । उसे छिपाकर रखने की समस्या टेढ़ी थी ।

पड़े ब्दों के सामने पीड़ी-सिगरेट पी भी नहीं सकते थे । परा- धीनता चुरी लगी। आत्म-हत्या का कुविचार उठा जो फिर एक कडुये अनुभव के बाद हमेशा के लिये समाप्त हो गया ।

लेखक रामप्रकाश कपूर-Ramprakash Kapur
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 85
Pdf साइज़6.7 MB
Categoryआत्मकथा(Biography)

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