राष्ट्र व्यंजन | Rashtra Vyanjan

राष्ट्र व्यंजन | Rashtra Vyanjan Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

सम्पूर्ण पुस्तक के लेखनोपरान्त जो लिखी जाय वह अन्तिमा ही तो है। मेरी दो काव्य-पुस्तकें ही तो पूर्व प्रकाशित थीं, (१) मानवतावादी, राष्ट्रीयतावादी, रूढ़िवाद-विरोधी

एवं शोषण-मुक्तिवादी संकलन ‘गणदेवता” और (२) स्वतंत्र भारत की सम्यक् शासन-व्यवस्था का उत्प्रेरक प्रबन्ध-काध्य ‘अशोक’ । अर्थाभाव के कारण इन सन्दर्भों की समस्त रचनाओं का प्रकाशन सम्भव नहीं,

अतः चयनित करनी पड़ी और बहुत सी रचनाएँ छुट गई । सन्तुष्ट हूँ कि चार दिशाओं में आवश्यक सेवा सम्भव हो सकी और भारत की छवि भी यथासाध्य उजागर हो सकी ।

कवि-रूप में अपनी छवि उजागर करना जब आरम्भ में भी अपना उद्देश्य नहीं था तो अन्त में क्यों हो ? हाल में नारीजीवन सम्बन्धी काव्यचयनिका ‘शक्तिमयी’ प्रकाशन हुई। अस्तु ।

अपने राष्ट्र का स्वरूप मधुर ही तो है नहीं प्रत्युत कटु भी है । स्वास्थ्यकर भोजन के छह समन्वित रसों में एक रस कटु भी है । स्वभावत: कटु सत्य भी अंकित करने पड़े हैं ।

काव्य का मूलाधार ‘सत्यम्” ही तो हैं। फिर भी मैं कटुसत्य-कथन के लिए क्षमाप्रार्थना का परिहार नहीं करता । अतः जमाध्रार्थी हूँ। यों ‘हितम् मनोहारि च दुर्लभम् वचः’, साहित्य में यथार्थ भी तो अनिवार्य ही है ।

अर्थाभाव में इस निवेदन को भी सक्षिप्त ही रखना | जीवनपर्यन्त अर्थाभाव का मूल कारण रही मैरी बाल-प्रतिज्ञा- ‘सूगा न द्रव्यवण भी मैं राष्ट्र से कभी । आय-व्यवसाय-प्रवृत्ति से पृथक् रहा ।

६७वें से ७३वें वर्ष की आयु-अवधि में बिहार सरकार ने मुझे सरकारी सेवक मान लिया। संतोष है कि सरकार मुझे घपले-घोटाले से मुक्त मानती रही । मेरे लगातार आग्रह पर भी वह मुझे छोड़ने की प्रस्तुत न थी। इसका कोई पेन्शन तो सम्भव नहीं। स्वाधीनता

लेखक रामदयाल पांडे-Ramdayal Pandey
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 84
Pdf साइज़4.7 MB
Categoryसाहित्य(Literature)

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