प्रेमि भक्त | Premi Bhakt

प्रेमि भक्त | Premi Bhakt Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

विद्वान् बुमरोहित विश्वमङ्गलसे मायके मन्त्रोंकी आधि करवा रहे हैं परन्तु उसका बर ‘चिम्तागणि’ की बिन्तामें निमन्त है। उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता । किसी प्रकार श्राब

समाप्त कर बैसे-तैसे माझणंको झटपट भोजन फरमाफर वित्वमङ्गल चिन्तामणिके अर बानेको येणार दुआ । सन्ध्या हो चुकी भी, लोगोंने समझाया कि ‘माई । धान तुम्हारे पिताका श्राद्ध है,

दे्पाके बर नहीं जाना चाहिये’, परन्तु कौन सुनता या है उसका दृदय तो कनीका धर्म कमसे ए्य हो चुका बा । विल्वमक्षल दौड़कर नदी के किनारे गया । भावान् की माया अपार इै,

अकरमाद् प्रदळ बेगे कान आया और उसके साय मुसलियार परयों होने ी। आकराक्षने व्यकार छा गया खाली मानक गर्जना और बिजली की कड़कदाहदसे जीवमात्र मवमीत हो गये ।

रात दिन नदीमें रहनेवाले केन्टोंने यो नावोंको किनारे बोनकर दृ्षोंका आश्रय छिया, परग्तु विल्कम ्पर इन समका कोई असर नहीं पड़ा । उसने पेटी से उस पार है चलने को कहा,

बार-बार विनती की, उतराईका भी गहरा काउच दिया परन्तु मृत्युशा सामना करनेको कौन तैयार होता ! सबने इन्कार कर दिया। व्यो-न्यो बिलम्ब होता था, ग्पो-ही-गयं बिश्वम् व्यासुळता बद ती जाती थी।

अन्तवें यह अधीर हो उठग और कुछ ना आगा-पौछा न सोचकर तैरकर पार जाने के लिये सहसा नदी में कूद पड़ा 1 मयानक दुःसाइसका कम था १रन्तु ‘कामाद्वराणां न मपं नसंयोगस

नदीमें एक मुर्दा बहा जा रहा या बिलमङ्गত तो बेहोश मा, उसने उसे काट समझा और उसीके सहारे नदीके उस पार चला गया । उसे अपडेट सुध नहीं है, बिल्कुल दिगम्वर हो गया है,

चारों ओर अन्धकार छाया हुआ है, बनेके पशु भयानक शम्द फर रहे हैं, कहीं मनुष्पकी गन्ध भी नहीं आली, परन्तु विन्वमहछ उन्पततकी मॉति अपमी पुनर्मे चमा जा रहा है ।

लेखक Gita Press
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 128
Pdf साइज़3.1 MB
Categoryधार्मिक(Religious)

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