नविन अर्थशास्त्र की रूपरेखा | Naveen Arthshastra Ki Rooprekha

नविन अर्थशास्त्र की रूपरेखा | Naveen Arthshastra Ki Rooprekha Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

सूस करते हैं कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता । एक अणु का, या देह की एक सेल का क्या मूल्य है । लेकिन कई अणु और रेल जब संगठित हो बते हैं तब उनकी ताकत और आयु बढ़ जाती है। मनुष्यों के साथ भी यही अत लागू है।

श्रम-विभाजन सीधा भी हो सकता है और पेचीदा भी। उसका प्रभाव मजदूरों, उपभोक्ताओं और समाज पर पड़ता है । प्रभाव प्रति. कूल और अनुकूल दोनों हो सकते हैं, लेकिन वे अनुकूल अधिक है। मजदूरों पर श्रम-विभाजन के अग्रलिखित अनुकूल प्रभाव पड़ते इससे निपुणता बढ़ती है ।

अभ्यास से सुगमता होती है। इससे आदमी को नेसर्गिक विशेषताओं का सदुपयोग होता है और उनकी संवृद्धि होती है। इससे गोल मुराकों में चौकोर बूटियों को ठूसने जरूरत नहीं होती। इससे जिज आदमी को कुछ नहीं आता है जो यद भी उसे सीख सकता है । शन और निपुणता नेता बन जाती है।

समय की बचत होती है। उत्पादन की गति बढ़ जाती है। न्यूनतम श्रम से अधिकतम लाभ उठाया जा सकता है। अनायास काम करने की आदत बढ़ती है । मसलों पर करम जोर पड़ता है। काफी अवकाश मिलता है मजदूरों को मजदूरी बढ़ जाती है। अपनी को भी काम मिल पाता है ।

मजदूर अनुसन्धान तौर श्रादिष्कार भी कर लेते हैं । उत्तरदायित्व का भाव भी पनपता है। अन्योन्याश्रय भाव भी उदित होता है । लेकिन मजदूरों को कुछ नुकसान भी होता है । इससे एकरसता बढ़ती है। मानसिक श्रमिक को देहिक दुर्बलता और देदिक श्रमिक को मानसिक दुब लता होती है।

लेखक केदारनाथ प्रसाद-Kedarnath Prasad
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 221
Pdf साइज़14.3 MB
Categoryअर्थशास्त्र(Economy)

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