नारद और शांडिल्य भक्ति सूत्र | Narad Aur Shandilya Bhakti Sutra

नारद और शांडिल्य भक्ति सूत्र | Narad Aur Shandilya Bhakti Sutra Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

१२-यदि कहें, वहाँ दर्शनका ही फल (स्वाराज्य) बताया गया है, अत: प्रकरण भी उसीका है, तो ठीक नहीं; क्योंकि ‘स स्वराड् भवति (वह परमात्मास्वरूप हो जाता है) इस वाक्यके ‘सः ‘

(वह) पदसे समीपवर्ती ‘आत्मरति:ः’ पदका ही ग्रहण होता है; दूरवर्ती ‘एवं पश्यन्’ का नहीं; क्योंकि वहाँ उससे (‘आत्मरति:’ आदि पदसमूहसे) व्यवधान पड़ता है। (अत: वहाँ दर्शनका नहीं, आत्मरतिरूपा भक्तिका ही फल स्वाराज्य-सिद्धि है।)

दृष्टत्वाच्च॥ १३॥१३-लोकमें ऐसा ही देखा भी गया है ।(अर्थात् किसीके रूपका दर्शन, गुणका श्रवण या स्वरूपका परिचय पहले प्राप्त होता है और उसके प्रति अनुराग पीछे होता है।

अतः दर्शन या ज्ञानका फल प्रीति है, प्रीतिका फल ज्ञान नहीं; इसलिये ज्ञान अङ्ग है और भक्तिकी ही मुख्यता है।)अत एव तदभावाद्वल्लवीनाम् ॥ १४॥ १४-क्योंकि ज्ञान अप्रधान है और भक्ति ही

शाण्डिल्य-भक्ति-सूत्र २५ १६-पहले ब्रह्मज्ञान होता है, फिर भक्ति, यह बात पहलेके श्लोकमें कही भी गयी है। एतेन विकल्पोऽपि प्रत्युक्तः ॥ १७ ॥ १७-ज्ञान अङ्ग है और भक्ति अङ्गी, ऐसा

परमा नुरागरूप भक्तिसे ही गोपाङ्गनाओंकी मुक्ति हो गयी। (ऐसा पुराणोंमें वर्णन आता है।*) भक्त्या जानातीति चेन्नाभिज्ञप्त्या साहाय्यात् ॥ १५॥ १५-भक्त्या मामभिजानाति’ (गीता १८। ५५) –

भक्तिसे मुझे भलीभाँति जानता है; इस वचनके अनुसार भक्ति ही साधन और ज्ञान ही साध्य है, ऐसा कहें तो? यह ठीक नहीं है, क्योंकि वहाँ ‘ अभिजानाति’ कहा गया है। अभिपूर्वक ‘ज्ञा’ धातुका अर्थ है

अभिज्ञा; अभिज्ञा कहते हैं पहलेकी जानी हुई वस्तुके ज्ञानको। पहले ज्ञान हुआ फिर फलरूपा भक्ति हुई। वह भक्ति ही अभिज्ञप्तिरूपसे पूर्वज्ञानका स्मरण कराकर स्वयं ही जीवके भगवत्प्रवेशमें सहायक होती है।

प्रागुक्तं च॥ १६॥ मयि भक्तिर्हि भूतानाममृतत्वाय कल्पते। दिष्ट्या यदासीन्मत्स्त्रेहो भवतीनां मदापनः ॥ (श्रीमद्भा० १०। ८२। ४५) २६ नारद-भक्ति-सूत्र एवं शाण्डिल्य-भक्ति-सूत्र

लेखक Gita Press
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 16
Pdf साइज़1 MB
Categoryधार्मिक(Religious)

नारद और शांडिल्य भक्ति सूत्र | Narad Aur Shandilya Bhakti Sutra Book/Pustak Pdf Free Download

1 thought on “नारद और शांडिल्य भक्ति सूत्र | Narad Aur Shandilya Bhakti Sutra”

Leave a Comment

Your email address will not be published.