मकरध्वज अथवा चंद्रोदय स्वर्णसिंदूर विधान | Makardhwaja

मकरध्वज अथवा चंद्रोदय स्वर्णसिंदूर विधान | Makardhwaja Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

आग की और ह। इमे १िनआि ख हे। अपरापर कपको पानी में गोबरला , जिससे परीश परापर संगो और अशि . परमी से पारए गोमे से निखन पार कपरी पात्र के दि में धुं के रूप में कम जाय। दिन बर की अग्नि देकर चुलछे में से निकाल ले और इस ढमरबंत्र को रात भर ठंडा होने के।

प्रातःकाल इस यन्त्र को धीरे से सोल कर ऊपरी पात्र के ऊपरी परदे से पारद निकालकर कपड़े से बाग ले । यदि अनि की कमो से नीचे के पात्र की राख में पारद याको रहने की शंका हो तो उस राख को फिर डमरू यन्त्र में चढ़ाकर बाकी पारद निकाल ले। इस संस्कार में अग्नि के ठोक लगने से पारद ठोक निकलता है।

तीत्रात्नि से पड़ कर पारद कभी कभी कम निकलता है या अग्नि को कमी से पारद नोचे पढ़ा रहकर ऊपर कम चढ़ता है। यह पाँच संस्कार पातन-संस्कार का एक भेद ऊष्ध्वपावन संस्कार है । हड को छाल ३ तो० बहेड़े की छाल ३ तो

राई ३ तो० चित्रक ३ नो० सेंधा नमक३ तो० सहिजन के बोज ३ तो० सप चोजें पोस कर बारोफ चूयो कर ले । इसके साथ उध्वसंस्कार संस्कृत पारद को नोबू के रस से घोट कर नष्ट पिट कर ले । ज पिट्ठो खूब बारोक हो जाय त्व पहले पातन संस्कार की तरह दो मिट्टी के पात्र लेकर

एक पात्रऊपर लिखी चीजों के साथ खरल में पारद डालकर नौवू के रस से नष्टपिष्ट कर “गोला बना लेना इस गोवे को मिट्टी के ऐसे पात्र में रखना, जिसमें ४ सेर जल भरा जा सकता हो। इतना हो बड़ा दूसरा मिट्टी का पात्र

लेखक विवेचक-Vivechak
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 51
Pdf साइज़3.6 MB
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