माँ और बच्चा | Maa Aur Bachcha

माँ और बच्चा | Maa Aur Bachcha Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

बहुत सी नव घुओं को जिनको पहले पहल गर्म रहता है यह भय रहने लगता है कि यदि पेट का बालक अधिक योटा ताजा हो जायगा तो जनवे समय बहुत दुःख उठाना पड़ेगा । इस ही कारण वे दूध, घी आदि पुष्टिकारक भोजन नहीं खाती है ।

परन्तु उनका यह विचार विछङ्कल झूठा है, बल्कि इसके विपरीत यदि पेट का बालक और गर्भिणी दोनों ही पूरे वाकतवर होने हैं तो बहुत ही सुगमता से बच्चा पैदा हो जाता है, और यदि दुब ल होने हैं तो बच्चा बड़ी कठिनता से पैदा होता है,

भारी कष्ट उठाना पड़ता कभी २ ता है कई २ दिन तड़पते वीन जाते हैं और जान पर भी इन आती है। इस कारण मर्भिणी को तो अपनी भी ताकत बढ़ाना और पेट के बच्चे को भी हृष्ट पुष्ट बनाना ज़रूरी है । इसके बास्सै आसानी से हजम हो जाने वाला उत्तर पुष्टिकारक भोजन करते रहना,

गाय का ताजा दूध पीना, हरी तरकारी व ताजे. फ: खाना, खुची शुद्ध वायु में रहना, नहा धो कर साफ सुथरी रहना, साफ सुथरे कपड़े पहनना, मकान को साफ रखना, काम काज में लगे रहना, सुस्त नहीं पड़े रहना, सोच, फिकर और क्रोध बिलकुल नहीं करना,

हंसी खुशी में ही दिन बिताना,-पह सब बहुत जरूरी है।सातवें महीने में बालक के सभी अंग पूरे हो जाते हैं और पैदा होने पर जीवित भी रह सकता है परन्तु बहुत ही दुबला पतला और कमजोर रहता है। आठवें महीने में पैदा होने से शायद ही कोई बालक जीता है ।

असली कुदरती पैदायश तो गमे से कम से कम २७२ दिन पीछे और ज्यादा से ज्यादा २८० दिन पीछे होती है । सातवें या आठवें महीने में बच्चा पैदा न हो जाय इस बात के बचाव के वास्ते भारत में सातवें आठवें महीने गर्भिणी का दिल बहलाते रहने का दस्तूर था ।

लेखक हीरालाल मारोठिया-Hiralal Marothiya
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 85
Pdf साइज़3.7 MB
Categoryउपन्यास(Novel)

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