कुत्सित जीवन और दांपत्य विमर्श | Kutsit Jeevan Aur Dampatya Vimarsh

कुत्सित जीवन और दांपत्य विमर्श | Kutsit Jeevan Aur Dampatya Vimarsh Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

इसकी पिळ्री से पता लगता है कि खाली करोड़ों मनुष्य इसका अध्ययन करते हैं। पागलखानी बाहर भी करोड़ों पागल रहते हैं। जिस प्रकार पागल अपनी एक निराली ही दुनिया में रहता है, उसी प्रकार, असबारों और किताबों के दुरुपयोग के इस जमाने में,

उन्हें पढ़ते समय, मनुष्य भी एक नई दुनिया में रहता है और इस संसार के सारे उत्तरदायित्व को भूल जाता है। अश्लील साहित्य पढने वाले अपने विचारों के अश्लील संसार में भटकते फिरते हैं । “

इन सब दुष्परिणामों का कारण क्या है ? इन सबकी जड़ में लोगों की यही भूल है कि ” विषयभोग किये विना चल नहीं सकता ” और बिना इसके मनुष्य का पूर्ण विकास भी नहीं हो सकता । ऐसा विचार हृदय में आते ही मनुष्य की दुनिया पलट जाती है जिसको अबतक वह बुराई समझता था,

उसे अब भलाई समझने लग जाता है और अपनी पाशविक इच्छाओं को तृप्ति के लिए नये-नये उपाय हूँ ढ़ने लगता है। आगे चलकर अध्याय, पृष्ठ और कविताओं आदि के उद्धरण देकर ब्यूरो यह सिद्ध करते हैं कि आजकल दैनिक-पत्र, मासिक पत्रिकाओं, पुस्तिकाओं,

पन्यासों और तसवीरों इत्यादि से दिन प्रति दिन लोगों को इस अधम प्रवृत्ति को उत्तेजना ही मिलती जाती है।पर अभी तक तो व्यूरो ने केवल अविवाहित लोगों की ही दुर्दशा दिखाई है। अब आगे चलकर वह विवाहित लोगों के भ्रष्टा- चार का भी दिग्दर्शन कराते हैं ।

वे कहते हैं कि अमीरों, किसानों और मध्य श्रेणी के लोगों में विवाह अधिकतर या तो मूठी प्रतिष्ठा या धन के लालच के कारण होते हैं । कोई अच्छी-सी नौकरो, जायदाद, पुराने व्यभिचार का नीति के आवरण से ढकना, व्यभि

लेखक महात्मा गांधी-Mahatma Gandhi
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 147
Pdf साइज़10.4 MB
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