कल्याणकारी प्रवचन | Kalyankari Pravachan

कल्याणकारी प्रवचन | Kalyankari Pravachan Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

हम भगवान्के आश्रित हो जायें अथवा संसारका आश्रय छोद दें दोनों का एक ही अर्थ होता है। संसारका आश्रय सर्वथा छृट जानेसे भगवानका आश्रय स्वतः प्राप्त हो जाता है

भगवान के सर्वथा आश्रित हो जाने से संसारका आश्रय स्वतः छूट जाता है। इन दोनॉंमेसे किसी प्रककी मुख्यता रखकर चलें अथवा दोनॉको साथ रखते हुए चलें, एक ही अवस्था हो जाती है अर्थात कल्याण हो जाता है।

भगवानके आश्रित होने में संसार का आश्रय ही खास बाधक है। संसारका आश्रय न छूटनेमे खास कारण है संयोगजन्य सुरकी आसक्ति । संयोगजन्य सुखमें मनका जो खिंचाव है, प्रियता हैं,

यही संसारके आश्रयकी, संसारके सम्बन्धकी सास जड़ है। यह जड़ कट जाय तो संसारका आश्रय छूट जाएगा परन्तु भीतर संयोगजन्य सुककी लोलुपता रहते हुए

बाहरसे चाहे सम्बन्ध छोड़ दो, साधु भी बन जाओ, पैसा भी छोड़ दो, पदार्थ भी छोड़ दो, गाँव छोड़कर जंगलाम भी चले जाओ, तो भी संसारका आश्रय छूटेगा नहीं।

संयोगजन्य सुख आठ प्रकारका है হাद, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, मान (शारीरका आदर-सत्कार), बढ़ाई (नामकी प्रशंसा) और आराम। ये आठ प्रकारके संयोगजन्य सुख ही मूल बाधाएँ हैं।

जयतक इन सुखोमे आकर्षण है, प्रियता है, ये अच्छे लगते हैं, तबतक ससारका आश्रय छूटता नहीं और संसारका आश्रय छूटे बिना सर्वथा भगवानका आश्रय होता नहीं।

अगर केवल भगवान का ही आश्रय ले लिया जाय तो संसारका आश्रय छूट जायगा। संयोगजन्य सुखका बड़ा भारी आकर्षण है। पर वह कब छूटेगा ?. जब मनुष्य केवल भगवानका आश्रय लेकर भगवान्के भजन-स्मरणमें लीन होगा।

भगवान के भजन -स्मरणमें लीन होनेसे जब पारमार्थिक सुख मिलने लगेगा, तब संयोगजन्य सुख सुगमतासे, सरलतासे छूट जायगा । उस पारमार्थिक सुखमें इतनी विलक्षणता, अलौकिकता है कि उसके सामने संसारके सब सुख नगण्य हैं,

लेखक रामसुख दास-Ramsukha Das
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 124
Pdf साइज़7 MB
Categoryधार्मिक(Religious)

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