गिरवी घाटा | Girvi Ghata

गिरवी घाटा | Girvi Ghata Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

आते हो रामू स्वयं तेजी से उस बूढ़े के करीब पहुँचकर ओ दादाजी जरा बीड़ी सुलगाने के लिए माचिस तो देना कहते हो, वह बूढ़ा व्यक्ति झट से वहीं रूककर अपनी जेब से माचिस की डिबिया बाहर निकालकर रामू के हाथ में थमा देता है ।

रामू झट से उस माचिस की डिबिया को खोलकर उसमें से एक काडी निकालकर माचिस की पीठ पर रगड़ते ही वह काड़ो जलने लगती है, उस काड़ी की जलती हुई आग की नौ से अपने मुख में रखी हुई वोडी को सुलगा कर उसकी कसो को अन्दर तक खिचता हुआ

फिर उसी बीड़ी का धुंआ बाहर मुख से निकालता है और वापस माचिस की डिबिया को लो दादाजी कहते हुए उस वृक्ष को देते हुए अपने ऊपर उसका बहुत बड़ा एहसान मानते हुए वापस कर देता है।अब रामू अपनी जलती हुई बोडी का मजा लेते हुए

अपनी मानसिक थकावट को दूर करता हुआ वही सेठजी की दुकान के सामने चबूतरे पर आलतो-पालथी मारकर बड़े ही आराम के साथ बैठ जाता है। उसके मुस में की बोडी जैसे- जंसे जलते रहती है, वैसे-वैसे उसका धुंआ भी तेज रफतार के साथ निकलता है

जैसे रेलगाड़ी को शक्तिशाली बनाने के लिए उसकी ठंडी आग में कोयला डालने पर उसको नई शक्ति प्राप्त होती है वैसे ही रामू को भी उसकी दौड़ के जलते रहने से उसको एक नई शक्ति प्राप्त होते रहती है।

आते ही अपने कमर में रखी हुई चाबियों को बाहर निकाल कर, दुकान को लगाए हुए तालों को तीन इंच मोटी-मोटी और लम्बी कुंजियों के सहारे, अपने हाथों की सहायता से एक-एक कर सारे कुफलों को पांच मिनट तक परिश्रम कर खोलते हैं ।

लेखक देवीदास आत्माराम घोडके-Devidas Atmaram Ghodake
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 66
Pdf साइज़8.2 MB
Categoryउपन्यास(Novel)

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