गीता दर्पण | Geeta Darpan

गीता दर्पण | Geeta Darpan Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

भगवान्की दिव्यवाणी श्रीमद्भगवद्गीताके भाव बहुत ही गम्भीर और अनायास कल्याण करनेवाले हैं। उनका मनन करनेसे साधकके हृदयमें नये-नये विलक्षण भाव प्रकट होते हैं।

समुद्रमें मिलनेवाले रत्नोंका तो अन्त आ सकता है, पर गीतामें मिलनेवाले मनोमुग्धकारी भावरूपी रत्नोंका कभी अन्त नहीं आता। गीताके भावोंको भलीभाँति समझनेसे गीताके वक्ता (भगवान्-) का, श्रोता-

(अर्जुन-)का, गीताका और अपने स्वरूपका ठीक-ठीक बोध हो जाता है। बोध होनेपर मनुष्य कृतकृत्य, ज्ञातज्ञातव्य और प्राप्तप्राप्तव्य हो जाता है अर्थात् उसके लिये कुछ भी करना,

जानना और पाना बाकी नहीं रहता। उसका मनुष्यजन्म सर्वथा सफल हो जाता है।जैसे भक्त जिस भावसे भगवान्का भजन करता है, भगवान् भी उसी भावसे उसका भजन करते हैं (४। ११),

ऐसे ही मनुष्य जिस मान्यताको लेकर गीताको देखता है गीता भी उसी मान्यताके अनुसार उसको दीखने लग जाती है। जैसे मनुष्य दर्पणके सामने जैसा मुख बनाकर जाता है,

उसको वैसा ही मुख दर्पणमें दीखने लग जाता है, ऐसे ही भगवान्की वाणी गीता इतनी विलक्षण है कि इसके सामने मनुष्य जैसा सिद्धान्त बनाकर जाता है, उसको वैसा ही सिद्धान्त गीतामें दीखने लग जाता है।

जैसे भगवान् प्राणिमात्रके सुहृद् हैं (५। २९), ऐसे ही उनकी वाणी गीता भी प्राणिमात्रकी सुहृद् है। गीता सर्वतोभद्र है। जैसे भगवन्नामको किसी भी रीतिसे लिया जाय, वह कल्याण ही करता है,

ऐसे ही गीताका मनन-विचार धर्मकी दृष्टिसे, वर्ण-आश्रमकी दृष्टिसे, सृष्टि-रचनाकी दृष्टिसे, साधनको दृष्टिसे, सिद्ध पुरुषोंकी दृष्टिसे, छन्दकी दृष्टि से, व्याकरणकी दृष्टि से, साहित्यकी दृष्टि से आदि किसी भी दृष्टिसे किया जाय,

वह कल्याण ही करती है इसलिये इस ‘गीता-दर्पण’ में गोताको कई दृष्टियोंसे देखा गया है और उसपर विचार भी किया गया है। इस ‘गीता-दर्पण’के माध्यमसे गीताका अध्ययन । करनेपर साधकको गीताका मनन करनेकी,

उसको समझनेकी एक नयी दिशा मिलेगी, नयी विधियाँ मिलेंगी, जिससे साधक स्वयं भी गीतापर स्वतन्त्ररूपसे विचार कर सकेगा और नये-नये – विलक्षण भाव प्राप्त कर सकेगा

लेखक रामसुख दास-Ramsukha Das
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 425
Pdf साइज़35.6 MB
Categoryधार्मिक(Religious)

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