दोष विज्ञान | Dosh Vigyan

दोष विज्ञान | Dosh Vigyan Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

दोपोंके नियत मार्ग रुक जाते हैं। इससे वे चुरमित होते कोष्ठको बिगाड़कर अधिकताले उस आम को और रस रादि धातुओं को अनेक यार नीचे निकालते हैं ।

पकाशयमें बढ़ा हुआ समानवायु सञ्चित हुए कफ या पित्त या रक्तको बिदष्ठासे मिलाकर बार बार मरोड़के साथ निकाले उस अवस्थाको प्रवाहिका कहते है । अतिसारमै अनेक द्रव धानु निकलती हैं और प्रबाहिकार्े केवल कफ या रक्तही निकलता है।

आमाशय, और पक्वाशयके बीच में पिसधरावाली छुठी कला है, उसे ग्रहणी कहते हैं। उसका काम अपक्क प्रश्नको धारण करना और परिपक मतका लगाना है ।

प्रहणीका यल अग्नि और अग्नि ग्रहणोके आश्रित है। जच वातादि दोष कुपित होकर अग्निको आच्छादित करते हैं; जब श्रम्निरूपी बलके विगड़नेसे प्रहरी भी बिगड़कर अपने काव्व्यको (अ्रप् अन्नका धारण करना और पकका निकालना) ठीक ठीक नहीं करती;

कभी अन्नको बिना पकायेही त्याग देती है; और कभी पक्कमखको नियत समयपर भी विसर्जन नहीं करती, उसे ग्रहणी रोग कहते है। जो दोष विगड़ कर अग्निको ढक कर रोग उत्पन्न करे उसोके नाम से प्रहणी रोग कहाता है।

जैसे धात ग्रहणी, इत्यादि तीनों दोष के बिगड़ने पर उत्पन्न होनेवाली त्रिदोष ग्रहणी कराती है। हो जाता है तब शाहारका सार भाग कम निकलनेसे मसकी अत्यन्त वृद्धि होती है।

उस समय यदि अपानवायु कुपित हो जाचे तो वह मलके साथ गुदली में प्राप्त हो तत्रस्थ अन्य दो दोषोंको भी बिगाड़ देता है फिर ये तीनों दोष वहांके त्वचा, मांस, मेद, और रक्तको दूषित करके गुदामें मांसाइ्कुर उत्पन्न करते हैं।

मस्सोंके पैदा होने पर जब अपानवायुकी गति रुकने लगती है तथा यह उभय मार्ग को प्राप्त हो शेष चार प्रकारके बातों को तथा पांचो प्रकारके पित्त और कफोको कुपित करता है । इससे गुदामें मस्सा होवेपर तीनों दोषों में विकार होता है। जो दोष अधिक विगड़ा होता है उसके ही नामसे वह उसे कहाता है।

लेखक वैदावर बाबू राधावल्लभ-Vaidavar Babu Radhavallabh
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 46
Pdf साइज़3.6 MB
Categoryसाहित्य(Literature)

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