धरम ध्यान | Dharam Dhyan

धरम ध्यान | Dharam Dhyan Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

ये ही येबादत बंदगी भाई। कैनेह दुनीया का छोडो भाई।।नेहे दुनीया घना हये भोडा। जीवकु काला कर रहे खोटा ।।नुर जीकर से राहपर चालो । तोबा सेती जीवलज आलो ।॥

जे बंदा साहेब की याद करे। तो साहेब भी उसकी याद करें।॥ अने हरदम साहेब का सुकर करे। तो कुफर उस दील से दुर पडे॥ पहेले तोबा करवो भाई। पाछे बंदगी करवो भाई ॥ दुनीया से जाना हयेगा भाई ।

मुसाफर ईसका नाम धराई। मुसाफर अपने चलने की। फिकर कर पीहुके मिलने की ॥ वखत चलने के फेर पस्तावे। पस्ताये से कछु हात न आवे॥ येवी बाता दिल से धरे। तब नुर ईमान उस हृदे भरे ॥

जब होवे जीभ और दिल तुज पाख। तब होये मराबत ईस पुतले खाक ॥ भाई साचे बोल साहेब के भावे। और जे झुठा बोले दोजख जावे ॥ साहेब आगल बोले साच । तो कुछ ना लागे उसकु आंच ।॥

जीवकु अपने येक ज ठाम । रख कर लेवो साहेब नाम ।।जीवडा येक बहु ठाम ले जावे। और गफलत माहे दीन गमावे ॥ तब झुरबांजुंबना रंग मे थावे। और ढोरो मांहे जनम गमावे

तन मन से जब न्हासे लुझ। डावी जमनी पडसे सुझ ॥ डावी जेमनी पसली माहे । बैसा दुसमन खबर कुछ ना है ॥।चार नफस है सामळो भाई। ईसकी खबर कुछ तम ने पाई॥ तीस पर सैतान पांचवा बैरी।

साहेब राहा बीसरा ये घनेरी ॥ बुरी बाता वो बहोत सी खावे। साहेब राहा वो बहुत भुलावे ॥ नाम च्यारों के न्याने हयेगे। येक येकज से भारी आयेगे ॥ कामे अपने जुदे-जुदे। येक येकजकु दखलन दे । नाम ईन सबके सांभळो भाई। सांभळो सगले राहापर आई ॥

लेखक फरमानजी बिस्मिल्ला-Farmanji Bismilla
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 15
Pdf साइज़2.5 MB
Categoryसाहित्य(Literature)

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