भाईजी चरितामृत | Bhaiji Charitamrita

भाईजी चरितामृत | Bhaiji Charitamrita Book/Pustak PDF Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

दादीजीको उनका बड़ा संग रहता था। मैं समझता हूँ–यह कहना नहीं चाहिये पर मेरा विश्वास है कि दादीजीको हनुमान्जीका साक्षात्कार हुआ था। हमारे घरमें उनकी बड़ी प्रतिष्ठा थी और आस-पास के लोग भी उन्हें बहुत मानते थे।

उनका असर मेरेपर भी पड़ा। महान् संत श्रीबखन्नाथजी महाराजकी कृपा मुझे दादीजीके कारण ही प्राप्त हुई थी। स्वामी हरिदासजी आदि महात्माओंका प्रसाद उन्हींके कारण मिला था।

मेरी दादीमें बुद्धिमत्ता के साथ सरलता, उदारता के साथ मितव्ययिता, स्वाभिमानता के साथ विनय, साधु-सेवाके साथ सावधानी, सहिष्णुताके साथ परदुःखकातरता–सभी एक से एक विलक्षण गुण थे उनमें वे बड़ी ही निर्भीक और आस्तिक थीं।

भगवान्‌की सत्ता तथा कृपापर उनका अटूट विश्वास था। बड़े-बड़े कष्टोंको उन्होंने बड़ी सरलता तथा साहसके साथ सहन किया था। उनकी परदुःखकारता तथा उदारताका एक प्रसंग यहाँ लिखा जा रहा है।

उन दिनों व्यापारमें हु ढिलाई थी। मेरी बुआकी एक लड़कीका विवाह था। विवाहका भार प्रायः हमारे ही ऊपर था। पिताजी चिन्तित थे। किसी प्रकार पाँच हजार रुपयेकी व्यवस्था हुई।

विवाह के दिन बहुत समीप थे। रुपये दादीके पास थे, उन्हींको सारी व्यवस्था करनी थी। उनका इतना तेज था कि अपने घरमें ही नहीं, दूरके सम्बन्धी तक बड़े सम्मानके साथ उनका शासन मानते थे।

इसी अवसरमें एक दूर-सम्पर्कय सम्बन्धीके घरकी एक महिला दादीके पास आयी। उनके कारोबारमें घाटा लग गया था। उसने दादीसे सारी बातें कहीं दुखियोंका दुःख सुनने में दादीजी बड़ी दिलचस्पी रखतीं,

बड़ी ही सहानुभूतिके साथ उनके दुःखकी बातें सुनत। दादीने सन बातें सुनीं। उनको पाँच हजार रुपये की जरूरत थी। उसके पतिने स्वयं न आकर अपनी पत्नीको इसीलिये दादीके पास भेजा था

दादीका दयालु हृदय सुनते हो द्रवित हो जायेगा और वे किसी तरह व्यवस्था कर देंगी। उस महिलाने बड़े करुण स्वरसे कहा- ‘ताईजी! आप व्यवस्था न करेंगी तो हमारी बाप-दादोंकद इज्जत चली जायेगी। दादीका हृदय द्रवित हो गया।

लेखक Gita Vatika
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 273
Pdf साइज़1 MB
Categoryआत्मकथा(Biography)

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