भगवान कौटिल्य | Bhagwan Kautilya

भगवान कौटिल्य | Bhagwan Kautilya Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

धननन्द की लोमाम्नि में धूताहुति सदश श्रर उसकी अपार अक्षय धन राशि के यदि यथार्थ में कोई फर संरक्षक थे तो बह खंनिधाता दर्शक ही । राजकीय धन-कोष और वहखाने, धाम्प-भण्डार और बंगली पदार्थों के संग्रह उनके अधिकार में थे।

धन प्राप्ति की सरलता के लिए शंस्थागार और कारागृह पर भी उनका आधिपत्य था ।बकनास अपनी सर्वोच्च राजनीतिश्ता से देश को आतंकित करते थे तो दर्शक अतुल समृद्धि से शासन करता था।

रत्न, सोना-चाँदी, धन-धान्य, और समस्त प्रकार की द्रव्य-सामग्री का अपार संग्रह सम्पूर्ण सृष्टि में से लाकर राज-कोष में भरना ही उनका परम कर्त्तव्य था और उस कर्त्तव्य की पूर्ति में बाधक किसी भी व्यक्ति को मनेच्छत दश्ड देने का उन्हें अनियंत्रित अधिकार था ।

मगध राज्य के विगत दो सौ वर्ष के आय-व्यय का पूरा-पूरा हिसाब उनकी जीभ पर था । अपने दस वर्ष के अधिकार में श्राय की महान् वृद्धि और व्यय न्यूनता की चर्चा लोगों से करते करते उनकी जीम घिस जाती थी।

नरेन्द्र हिरययगुप्त उन पर सदैव प्रसन्न रहते थे क्योंकि उन्हीं के कारण वह अपार धन-संचय कर सकते थे और संनिधाता नरेन्द्र पर लट्टू थे क्योंकि धनसंचय में उन पर कोई विषम प्रतिबन्ध न लगाया गया या- उनको सब कुछ

करने की पूर्ण स्वतन्त्रता थी। दर्शक स्वयं अपार धन-राशि के स्वामी ये और लोगों को ऋण देकर उसे चौगुना ब्दाने की कला में सिद्धहस्त थे ।ऐसे व्यक्ति के निमन्त्रण को कैसे अस्वीकृत किया जाय ? इस निमन्तरण का रहस्य

सेनाजित अच्छी तरह से जानता था।इस प्रतापी, सर्वसत्ताधिकारी समिधाता का प्रभाव घर में पैर रखते ही नौ दो ग्यारह हो जाता था संनिधाता पचास वर्ष की आयु के गोल-मटोल राहस्थ ये और अपनी तीसरी बार की सुन्द

लेखक कन्हैयालाल मुंशी-Kanaiyalal Munshi
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 240
Pdf साइज़10.5 MB
Categoryइतिहास(History)

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