आनन्द प्रबोध | Anand Prabodh

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पुस्तक का एक मशीनी अंश

हरिको भजे सो हरि का होई

भजन क्या है ? ‘भजनं नाम रसनम्’ -भजन माने स्वाद लेना। जैसे आप भगवान् के बारेमें सुनते हैं- यमुनाजीका तट है, . बालुकामय पुलिन है, मोर नाच रहे हैं, पक्षी चहक रहे हैं.

गौयें पानी पीनेके लिए जा रही हैं और उनके पीछे-पीछे ग्वाल बालोंके संग बाँसुरी बजाते नाचते श्रीकृष्ण जा रहे हैं तो ये बातें आपने सत्संगमें, भगवान्‌की कथामें सुनी और फिर गये घर और वहाँ जानेके बाद बारम्बार वे सुनी हुई

बातें आपके स्मृति पटपर आने लगीं। सुनी तो थी सत्संगमें और उसका एक संस्कार हृदयमें पड़ गया और अब निकाल-निकालकर उसका आनन्द लेते हैं।

तो ये जो सुनी हुई और देखी हुई कथा और लीलाको पुन: पुन: दुहरा करके उसका मजा लेना स्वाद लेना भजन है।

‘भजनं नाम रसनम्, भजनं नाम आस्वादनम्।’

भजन माने रसानुभूति- याद करके मजा लेना। इसका दृष्टान्त ऐसे भी देते हैं- जैसे गाय, बैल पहले घास-फूस खा लेते हैं। गलेके नीचे चला जाता है, पेटमें चला जाता है और फिर उसको लौटा-लौटा करके अपने मुँहमें लाते हैं और उसको चुगलते हैं,

चर्वण करते हैं (साहित्यिक लोग चर्वण शब्दका प्रयोग करते हैं, उनके यहाँ चर्वणा होती है- चर्वणा माने जुगाली करना), पागुर करते हैं (गाँवमें पागुर बोलते हैं), वैसे ही भगवान्की जो लीला देखी हुई है और सुनी हुई है,

उसको मनमें पुनः पुनः ला-लाकर उसका रसास्वादन करनेका नाम भजन है। भजनका अर्थ है- प्रीति पूर्वक सेवा। प्रीति होती है मनमें तो बाहर चाहे हाथसे पूजा करें, चाहे पाँवसे प्रदक्षिणा करें,

चाहे जीभसे स्तुति करें, चाहे साष्टाङ्ग दण्डवत् करें और चाहे मनमें ध्यान करें। हमारी जो प्रीति है, प्रीति माने तृप्ति- यह जो हम जगह-जगहसे रसास्वादन लेते हैं, तृप्ति लेते हैं,

उसकी जगह पर हमारी प्रीति, हमारी तृप्ति भगवान्‌के नाम, धाम, रूप, भगवान् की लीला भगवान् की सेवा, भगवान के दर्शनमें होनी चाहिए। भगवान्‌के नाममें जो रसास्वादन है- उसको भजन कहते हैं।

लेखक अखंडानंद सरस्वती-akhandanand Saraswati
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 32
Pdf साइज़1 MB
Categoryसाहित्य(Literature)

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