अग्निपंथी | Agneepanthi

अग्निपंथी | Agneepanthi Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

भूमिका के रूप में दो शब्द लिखने का साहस मुझमें न जाने क्यों और कैसे अपनी प्रथम काव्यकृति (गणदेवता नामक संकलन) के प्रकाशन की वेला में ही उदित हुआ था।

तब से आज तक मैं इस परम्परा का निर्वाह करता जा रहा हूँ। मेरे चिन्तन तथा लेखन में मानवतावाद एवं आशावाद भी आरम्भ में ही आ गये थे। स्यात् मुझे नैसर्गकि रूप में प्राप्त हुए होंगे।

मैंने अपनी ‘प्राणगान’ शीर्षक रचना में कहा भी तो था : ‘मैं निराशा की निशा में अमर आशा का सवेरा।’ सर्वथा अकिंचन, अनिकेत और सम्बलहीन व्यक्ति को भी आशावाद का सम्बल तो सुलभ हो ही सकता है,

यदि.उसके जीवनदर्शन में अनासक्ति विद्यमान हो। इस अदम्य आशावाद का ही परिणाम है इस काव्यकृति का प्रकाशन। यों अनेक काव्य- -कृतियाँ प्रकाशन-प्रतीक्षारत हैं,

परन्तु मैंने इस महाकाव्य को ही प्राथमिकता दी है। चूँकि ‘मन्वन्तर’ महाकाव्य इससे लघुतर था, अतः मैने उसे मुद्रणार्थ दे दिया था। स्वभावतः उसका प्रकाशन-व्यय अल्पतर था।

वह तो प्रकाशित हो ही गया। पाण्डेय रचनावली प्रकाशन में ढाई सौ रु० से अधिक राशि न थी और न है। अतएव ‘देवगीत’ के स्वत्वाधिकारियों ने मेरी कृतियाँ का प्रकाशन आवश्यक मानकर देवगीत प्रकाशन संस्थापित किया

इस प्रकाशन के द्वारा ‘मन्वन्तर (महाकाव्य) प्रकाशित हुआ इस प्रकाशन के द्वारा ही इस महाकाव्य का भी प्रकाशन हो रहा है और यथासम्भव अन्य कृतियों का भी प्रकाशन होगा। अस्तु ।

इस महाकाव्य के लेखन का संक्षिप्ततम इतिहास भी यहाँ अंकित करना अनुपयुक्त न होगा मेरी ओजस्प्रवृत्ति एवं राष्ट्र के स्वाधीनता संग्राम में मेरी भागीदारी और आजीवन देशभक्ति के कारण

अनेक सुधी साहित्यकारों ने प्रस्ताव किया कि मुझे के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर एक महाकाव्य अवश्य लिखना चाहिए। मैं भी यह लेखन आवश्यक मानता था, किन्तु प्रकाशन हेतु साधनाभाव था।

लेखक रामदयाल पांडे-Ramdayal Pandey
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 107
Pdf साइज़6.9 MB
Categoryकाव्य(Poetry)

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