अध्यात्म वार्ता | Adhyatm Varta

अध्यात्म वार्ता | Adhyatm Varta Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

प्रत्येक जीव प्रतिक्षण किसी न किसी वस्तु की आकांक्षा करता है। यह स्पृहणीय वस्तु गोचर हो सकती है यथा संपत्ति अथवा संतति अथवा वह वस्तु. अगोचर हो सकती है

क्या कीर्ति या शक्ति। यद्यपि स्पृहणीय वस्तुएं असंख्य हो सकती है परन्तु सच्चा लक्ष्य एक ही रहता है आनन्द निरपवाद रूप से प्रत्येक व्यक्ति ज्ञात अथवा अज्ञात रूप से आनन्द की उपलब्धि के लिए

प्रयत्नशील है। यहां तक कि बड़े से बड़े कूटनीतिज्ञ, वैज्ञानिक, व्यापार-विशारद एवं कलाकार भी वस्तुतः अपने विभिन्न क्रियाकलापों द्वारा आनन्द की ही खोज में लगे हैं

भले ही वे पूछे जाने फर इस सत्य को स्वीकार न करें । इच्छाओं की पूर्ति होने पर हमें जो विभिन्न प्रकार का संतोष प्राप्त होता है वह भी आनन्द प्राप्ति का साधन ही है।

परन्तु यह आनन्द क्षणिक एवं आशिक हैं । हमें जिस वस्तु की खोज है वह है विशुद्ध एवं स्थाई आनन्द।ऐसा क्यों होता है कि यद्यपि हम आनन्द की खोज में सतत् प्रयत्नशील रहते हैं

फिर भी वह हमें चकमा दे जाता है। क्योंकि हम गलत दिशा की ओर बढ़ते हैं। एक यात्री हरिद्वार से बद्रीनाथ को जाना चाहता है। यदि वह दक्षिण दिशा की ओर अग्रोता जावे तो क्या

कभी वह अपने गन्तव्य स्थान पर पहुंचे सकेगा? वह अपनी यात्रा में ज्यों-ज्यों अग्रसर होता जावेगा त्यों-त्यों वह अपने गन्तव्य स्थान से दूर हटला जावेगा।

ज्यों ही उसे अपनी गल्ती महसूस होगी. वह माया क्या है? इसका अर्थ है- यह जिसका अस्तित्व नहीं है। जिसे हम अपने चारों ओर देखते हैं- इस जगत या संसार का सध्या अस्तित्व नहीं है।

हम एक काल्पनिक संसार में निवास करते हैं और माया पति जैसी कल्पना करते हैं वैसी ही भायना अपने प्रन में उत्पन्न करते हैं। जिस प्रकार एक सम्मोहन विद्या जाननेवाला एक तालाब उत्पन्न कर सकता है

लेखक स्वामी पुरुषोत्तमानंद-Swami Purushottamanand
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 47
Pdf साइज़2.1 MB
Categoryकहानियाँ(Story)

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